Sunday, August 28, 2011

अग्निवेश देशद्रोही के साथ-साथ जनता का गद्दार निकला

अन्ना के समर्थन में मेरा अग्निवेश को लेकर अनुमान ठीक था कि अन्ना का अनशन इस भेड़िये के कारण संदेहस्पद लग रहा था। अब स्पष्ट हो गया कि अनशन तो सच्चा था किन्तु ये भेड़िया अग्निवेश देशद्रोही के साथ-साथ जनता का गद्दार निकला। आश्चर्य तो इस बात का है कि अन्ना टीम इतनी सुलझी हुई एवं अनुभवी है फिर अग्निवेश को अपना सदस्य कैसे बना लिया।

ये आरक्षण देश को निगल रहा है

ये आरक्षण देश को निगल रहा है----------- मैं शतप्रतिशत आरक्षण के विरोध में हूँ किन्तु आरक्षित श्रेणी के कदापि नहीं। आरक्षण आपसी प्रेम, भाईचारे को समाप्त कर रहा है, योग्यता को निराशा में धकेल रहा है, गुणवत्ता में अड़चन डाल रहा है। यदि बीपीएल को निष्पक्ष रुप में स्वीकार किया जाए तो क्या सभी जातियों को लाभ नही मिलेगा। आज संसद में स्वयं को घॉघ समझने वाले नेताओं ने जनलोकपाल बिल में भी दलित के लिए जगह देने की बात की । ये बताए कि क्या भ्रष्टाचार जाति धर्म पूछ कर किया जाता है।

Sunday, August 14, 2011

आजादी

आजादी

आजादी

तीन अक्षरों का मेल है

इसके बिना तो

घर में भी जेल है

आजादी

प्रतिक्षा है

जंजीरों की खनखनाहट से

छुटकारा पाने की

खुले गगन में साँस लेने की

आजादी

प्रतिष्ठा है

आत्मा की

पूर्वजों के सपनों की

और मानवता की

आजादी

चाह है

किसी को चाहने की

मिलकर कदम बढ़ाने की

आजादी

सपना है

कैद में रहने वालों का

घर में अस्सी पार कर चुके

बूढ़ी आँखों का

आजादी

अवसर है

गल्तियाँ सुधारने का

सीखने और सीखाने का

आजादी

खेल है

दानवता का

मानवता को

तहस नहस करने वालों का

Thursday, August 4, 2011

युवा संन्यासी / दिल्ली का श्वेत-रक्त

युवा संन्यासी

उठ भारत के सुप्त सिपाही, युवा संन्यासी आए हैं।
चिरनिद्रा से तुझे जगाकर, नवचेतना लाए हैं।

रामकृष्ण परमहंस सरीखे, संतों की ये बात करें।
नरेन्द्र को विवेकानन्द बनाने, का ये भी प्रयास करें।

कंटक-पथ पर तुम भी बढ़कर, ज्ञान की ज्योति जलाओगे।
इस आशा से तुम्हें जगाकर, इतिहास दोहराने आए हैं।

उठ भारत के सुप्त सिपाही, युवा संन्यासी आए हैं।
चिरनिद्रा से तुझे जगाकर, नवचेतना लाए हैं।

इनके मुख में रामदास और रामतीर्थ की वाणी है।
इच्छा तेरी वीर शिवा सी, संतों ने पहचानी है।

अफजलखाँ और शाइस्ताखाँ को, देश निकाला देना है।
धर्म स्थापना कैसे होगी, यह समझाने आए हैं।

उठ भारत के सुप्त सिपाही, युवा संन्यासी आए हैं।
चिरनिद्रा से तुझे जगाकर, नवचेतना लाए हैं।

चाणक्य-विदुर को ठुकराकर, शकुनि से मेल बढ़ाते जो।
जाति-पंथों के नाम पर, आपस में लड़वाते जो।

इन देशद्रोही जहरीले नागों से, बचके रहना हे नवयुवक।
तेरे अन्तर्मन में बसकर, तुझे जगाने आए हैं।

उठ भारत के सुप्त सिपाही, युवा संन्यासी आए हैं।
चिरनिद्रा से तुझे जगाकर, नवचेतना लाए हैं।

याद करो तुम ऋषि अरविन्द की, क्रान्ति-शोलों की गाथा।
बिस्मिल, सुभाष, आजाद, भगत का भारत माता से नाता।

सन् ६२, ६५ और ७१ के, योद्धाओं रणबाँकुरों को।
कारगिल में टाइगर हिल पर तिरंगे की, स्मृति दिलाने आए हैं।

उठ भारत के सुप्त सिपाही, युवा संन्यासी आए हैं।
चिरनिद्रा से तुझे जगाकर, नवचेतना लाए हैं।

फिर से खड़ा हुआ हिमालय, युवा संत के स्वागत को।
सागर की लहरें बढ़ती है, छूने जिनके चरणों को।

योगध्वज को लहराते, वाणी में अग्नि शोलों से।
ऋषि-मुनि के वंशज देखो, तुम्हें बताने आए हैं।

उठ भारत के सुप्त सिपाही, युवा संन्यासी आए हैं।
चिरनिद्रा से तुझे जगाकर, नवचेतना लाए हैं।

राणा की जंगल की रोटी, रानी के दत्तक बेटे को।
बन्दा की घायल आँखें और, गोविन्द के चारों बेटों को।

उठकर देखो तुम अपने, महापुरुषों को भूले बैठे हो।
इन अक्षम्य अपराधों से, तुम्हें बचाने आए हैं।

उठ भारत के सुप्त सिपाही, युवा संन्यासी आए हैं।
चिरनिद्रा से तुझे जगाकर, नवचेतना लाए हैं।

दिल्ली का श्वेत-रक्त

रक्त-श्वेत हुआ दिल्ली का,
नहीं जानती पीरपराई।
शहरी कदम अनदेखा करते,
निर्धन करता कैसे कमाई।
वो क्या जाने कैसे होगी,
उदराग्नि की लपटें शाँत।
निर्धन निर्धनता को बढ़ रहा,
गाँव-गाँव और प्राँत-प्राँत।
आँकड़ों में चिल्लाती दिल्ली,
जे॰ डी॰ पी॰ की दर चमक लाई।
अरे! ग्रामीण महिला को देखो,
तन पर फटी धोती आई।
एक धोती के दो हिस्से कर,
माँ-बेटी ने ढका है तन।
दिल्ली तुझको लाज न आती,
कब पिघलेगा तेरा मन।
जनता से तो तू नहीं डरती,
जनता की आह से डर।
या तो उनकी सुध ले ले,
अन्यथा नष्ट हो जाएगा तेरा घर।
अनिच्छा से ही शहरी सीमा,
लांघ के कभी तो गाँव में आ।
भूखे-बिलखते बूढ़े-बच्चे,
दिल्ली दो रोटी तो ला।

तेरे सिंहासन की चारों टाँगे,
इनके ही कन्धों पर है।
फिर भी आँकड़ों की क्रीड़ा में,
निर्धनता हाशिये पर है।

नर-नारायण होते ईश्वर,
स्वच्छ हृदय में वास करें।
सुन ले सदा को इनकी दिल्ली,
तुझसे कुछ ये आस करें।

सदियों से ये लड़ते आए,
निर्धनता से दीर्घ लड़ाई।
समान विकास हो देश का दिल्ली,
अब तो पाट दो ये खाई।

उमेश प्रताप वत्स

बरखा री बरखा, बरखा रानी,

n by परिकल्पना संपादकीय टीम | July 16, 2011 | 4


बरखा री बरखा, बरखा रानी,
ओ दीवानी तेरी मधुर कहानी।

धरती से तूने प्रीत बढ़ाई,
तभी बादलो से मुक्त हो आई।
ग्रीष्म ऋतु से झुलसे प्राणी,
प्रतीक्षारत्त सब अधम क्या ज्ञानी।

बादलों की तू महारानी,
इन्द्रसुता तू है मस्तानी।
तेरी रिमझिम बौछारों से,
मिट जाती है सब परेशानी।
बलखाती, अटखेली करती,
निकल पड़ी करने मनमानी।

कहीं गरजती कहीं बरसती,
कहीं बने भीषण तूफानी।
तेरी प्रथम बौछारों से,
सबके चेहरे खिल जाते हैं।
कीट-पतंगे तरूवर प्राणी,
पंछी भी चहचहाते हैं।

बौछारों से आगे चलकर,
क्यों बाढ़ की राह अपनाई।
कदम न ठिठके बरखा तेरे,
क्यों ताण्डव मचा दिया सांई।
बूढ़े बच्चों की चीत्कार,
झोंपड़-पट्टी में हाहाकार।
गाय-भैंसें और वन्य-जीव,
करबद्ध हे ईश रहे पुकार।
मानव को प्रकृति-दोहन की,
मैं मान रहा हूँ यही सजा।
किन्तु निर्धन-निर्दोषों की,
लाचारी को अब न और लजा।

अब शाँत होकर कदम रोक,
फिर अवसर दे अज्ञानी को।
मची त्राहि-त्राहि चारों ओर,
अब रोक ले इस मनमानी को।

मानव तुम भी प्रकृति का,
ये तीव्र दोहन बन्द करो।
बरखा रानी के आँचल में,
फिर से प्रेम-भाव भरो।