Sunday, May 8, 2011

माँ तुम माँ हो, मेरी ही नही जग की भी माँ हो।

मातृ दिवस पर सभी ब्लॉगर मित्रों पर वात्सल्यमयी शुभकामनाएं ।

 

 

विदित, जग मे मॉ का आँचल, बाल-क्रीडाओं से भरा हुआ।

विडम्बनाओ की हदे पार कर, वातस्लय से सजा हुआ।।

स्मरण रहेगा पल-पल हमे जीजाबाई का वो प्रसंग।

शिवा को लिटाया सूखे मे, भीग रहा अपना अंग।।

है पुत्र-धन सबसे बडा , समक्ष सब तुच्छ रहा।

जिसके सुख हेतु माता का, हर शब्द दुआ हुआ।।

सदियो ने भी माता के , वात्सल्य को गाया है।

ईश्वर से पहले मॉ का ही, चरण-रज लगाया है।।

विकट परिस्थितियों मे भी, कभी न डगमगाया है।

पुत्र की तुच्छ आह! पर भी, मॉ का दिल भर आया है।।

कृष्ण-यशोदा के प्रसंग मे, पुलकित हो रहा जल-थल।

कान्हा की अटखेलियों मे , आनन्दित हो रहा हर पल।।

बृज-गोकुल की ये राहे, बरसाना तक नाच उठी ।

मॉ के आँचल से किलकारियां , चँहू दिशा मे गूंज उठी।।

भगवान परशुराम जयंति पर समाज का दृष्टिकोण

5 मई को समाज के कुछ ब्राहम्ण समाज के लोगों ने  भगवान परशुराम जयंति अपने-अपने स्तर पर मनाई। भगवान परशुराम जी की कुछ ने शास्त्रों के अनुसार तथा कुछ ने अपने अनुसार व्यक्तित्व का वर्णन कर छवि पेश की। कुछ समाज के जागरूक लोग दिल से तथा कुछ राजनैतिक स्वार्थ अथवा अन्य स्वार्थ के कारण जंयति मना रहे थे । मैं अपने पत्रकार बन्धु के पास बैठा था तो एक महाशय का फोन आया कि भाई साहब मंत्री जी के गले में हार डालते हुए मेरी वाली फोटो जरूर आनी चाहिए। पत्रकार बन्धु ने कहा कि भैया स्पेस कम है एक ही फोटो आ सकती है तो हमने भगवान परशुराम जी की फोटो की वंदना करते हुए कुछ लोगों वाली फोटो डाल दी है। तो साहब का उत्तर था कि परशुराम जी क्या करेंगे अखबार में फोटो देखकर आप मेरी व मंत्री वाली ही फोटो डाल देना । पत्रकार के नानुकुर करने पर बहस हुई तो साहब ने कहा कि हाँ एक आपका उपहार भी कार्यक्रम में तय किया था वो मैं अपने आदमी के हाथ भेज रहा हूँ, तत्काल मित्र पत्रकार का जवाब था कि हाँ ठीक है जी आप भिजवा दीजिए और फोटो की चिन्ता न करे वो मैं बदलकर आप की लगा दूंगा। मैं मित्र के हाव-भाव देखता रह गया। कोई परशुराम जी को शुरवीर बताकर क्षत्रियों का दुश्मन बता रहा था, कोई ब्राहम्णों का तारनहार तो कोई राम से भी वीर बता रहा था कोई लक्ष्मण से बहस करने वाला ज्ञाता बता रहा था। कोई भगवान परशुराम जी से शुरू होकर मंत्री जी की प्रशंसा के ही गीत गाता जा रहा था तो कोई अपनी पार्टी के दायरे से बाहर ही नही निकल पा रहा था। किसी को सामने बैठी जनता वोट के रूप में दिखाई दे रही थी तो कोई विश्व पर फिर ब्राहम्णों के वर्चस्व की बात कह हवा में उड़ा जा रहा था।

एक भी व्यक्ति ने यह नही कहा कि भगवान परशुराम क्षत्रियों के दुश्मन नही अपितु निकृष्ट राजाओं के लिए कहर थे। तथा उन्ही का ही नाश करने के लिए उन्होंने परशु का प्रयोग किया। मानवता के लिए वे महान आदर्श थे। तथा ब्राहम्ण समाज ने सात्विक जीवन जीकर समाज को आज तक सही दिशा दी है तो आज भी मांस-मदिरा छोड़कर पूर्व की भाँति समाज में व्यक्ति निर्माण की आवश्यकता है।

भगवान परशुराम जी की जयंति को सही रूप में समाज को सही दिशा देने के लिए माध्यम बनाने का उददेश्य होना चाहिए । भ्रष्टाचार मुक्त समाज का निर्माण पर चर्चा होनी चाहिए तभी उस परम योगी महान शस्त्र-शास्त्र ज्ञाता का सही सम्मान हो सकेगा।Tulips

Wednesday, May 4, 2011

हिन्दी भवन दिल्ली में आयोजित परिकल्पना सम्मान समारोह पर एक काव्यमयी नजर

३० अप्रैल २०११ को दिल्ली के हिन्दी भवन में आयोजित परिकल्पना सम्मान समारोह में हमें भी शामिल होने का अवसर मिला। मेरे साथ यमुनानगर के चिट्ठाकार साथी ई-पण्डित श्रीश बेंजवाल तथा रविन्द्र पुँज जी थे। समारोह में मुख्य अतिथि  उत्तराखण्ड के मुख्यमन्त्री श्री रमेश पोखरियाल जी निशंक थे। उनकी प्रतीक्षा के दौरान खाली समय में मैंने लगे हाथ यह कविता लिख डाली। अविनाश जी की सलाह पर मैंने इसे मंच पर भी सुनाया। समारोह में कई विशिष्ट अतिथियों तथा चिट्ठाकारों से मिलना हुआ। यह कविता इस सुखद मिलन की याद के रुप में यह कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ।

--

बहुप्रतिक्षित सम्मान दिवस, हिंदी भवन में आ गया।

चहुँ दिशा से ब्लॉगर आए, भवन में आनन्द छा गया।

 

ब्लॉगर करे सम्मान हिन्दी का, हिन्दी बैठाए पलकों पर।

आज मिलन होगा धरा का, भास्कर से रश्मि-रथ पर।

 

वाचस्पति ने ध्वज लहराया, नुक्कड़ की प्रतिष्ठा से।

अनुभवी ब्लॉगर आगे आए, हो सफल आयोजन निष्ठा से।

 

गिरिराज ने देखो कैसे, समेटा समुद्री लहरों को।

संध्याकाल में हुआ सवेरा, धन्य प्रभात की मेहनत को।

 

निशंक जी की छत्र छाया में, चुन-चुन मोती एकत्रित हुए।

ब्लॉगर के सम्मान से देखों, फूल से चेहरे प्रसन्नचित्त हुए।

 

इंटरनैट की इस दुनिया में, ब्लॉगर ने दस्तक दे डाली।

दुनिया देखेगी हम मिलकर, फूल खिलाएँ बनकर माली।

 

पहली बार मिले ब्लॉगर, लगता पुराना साथ है।

ऐसे घनिष्ठता बढ़ रही, जैसे कभी की बात है।

 

बार-बार ये दिन आए, कि ब्लॉगर सब इक्ठ्ठे हो।

अगली बार मिले जब भी, सब पहले से हट्टे-कट्टे हों।

--

श्रीश जी एवं रविन्द्र जी के अनुभव यहाँ पढ़ें।