रविवार, 8 मई 2011

माँ तुम माँ हो, मेरी ही नही जग की भी माँ हो।

मातृ दिवस पर सभी ब्लॉगर मित्रों पर वात्सल्यमयी शुभकामनाएं ।

 

 

विदित, जग मे मॉ का आँचल, बाल-क्रीडाओं से भरा हुआ।

विडम्बनाओ की हदे पार कर, वातस्लय से सजा हुआ।।

स्मरण रहेगा पल-पल हमे जीजाबाई का वो प्रसंग।

शिवा को लिटाया सूखे मे, भीग रहा अपना अंग।।

है पुत्र-धन सबसे बडा , समक्ष सब तुच्छ रहा।

जिसके सुख हेतु माता का, हर शब्द दुआ हुआ।।

सदियो ने भी माता के , वात्सल्य को गाया है।

ईश्वर से पहले मॉ का ही, चरण-रज लगाया है।।

विकट परिस्थितियों मे भी, कभी न डगमगाया है।

पुत्र की तुच्छ आह! पर भी, मॉ का दिल भर आया है।।

कृष्ण-यशोदा के प्रसंग मे, पुलकित हो रहा जल-थल।

कान्हा की अटखेलियों मे , आनन्दित हो रहा हर पल।।

बृज-गोकुल की ये राहे, बरसाना तक नाच उठी ।

मॉ के आँचल से किलकारियां , चँहू दिशा मे गूंज उठी।।

2 टिप्‍पणियां:

  1. माँ तुम माँ हो, मेरी ही नही जग की भी माँ हो।
    अति सुंदर।

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  2. umesh jee... maa ek aisa shabd hai jismein pura sansaar chhipa hota hai... bloggers meet mein aapse mila tha... achha laga mil kar... jald fir milne kee khwahish rahegi... itni jaldi kavita bana di wo v jaandaar...

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