गुरुवार, 31 अक्तूबर 2013

बम फोड़ो लाहौर में

मौत का नाच
डूबो डालों रावलपिंडी को, बम फोड़ों लाहौर में,
फिर से धोखा कर सके न कोई, दीवाली के त्यौहार में।
बन्द करो ये तगमें देने, देश के गद्दारों को,
फंदे पर लटका डालों इन, आतंकियों के यारों को।
अब ओर न लज्जित करो, शहीदों के परिवारों को,
इस्लामाबाद पर टूट पड़ों, बोलो सिपहासलारों को।
अबकि सबक सिखा डालो, बस! एक ही वार में,
अमन-चैन से घूम सके सब, कश्मीर की बहार में।।
लोकतंत्र के मंदिर में, जिसने रक्त बहाया है,
मुम्बई के ताज में, मौत का नाच नचाया है।
छोटे-छोटे बच्चों को, आतंक का खेल सिखाया है,
आत्मघाती हमलों से, फिर हमको धमकाया है।
सिर कलम करने वालों से, बातें न हो प्यार में,
मददगारों को नंगा करो, भीड़ भरे बाजार में।।
हमारे बच्चों की रक्षा करें, बच्चों से दूर रहकर के,
चैन से सो ऐ देश मेरे, गये हमें यह कहकर के।
बर्फ के रेगिस्तान में, तैनात खड़े कष्ट सहकर के,
अकस्मात ही मौत बने, हिम-ग्लेसियर बहकर के।
इन वीरों का रक्त बिखरा, जैसे केशर की क्यार में,
इनको उचित सम्मान मिले, दिल्ली के दरबार में।।
 


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