रविवार, 8 अप्रैल 2012

कविता- छाया

छाया

मैं जिंदगी के थेपेड़ों से

रोज की तरह

कुछ उदास

और हताश

घर के आंगन में पहुँचा

गिरने लगा

पास ही बिछी खाट पर

महसूस करने लगा

नस-नस में थकान को

टूटने लगा

मेरा सारा बदन

तभी जोर से चीखते-चिल्लाते

दौड़ते-भागते

लड़ते-झगड़ते

बादलों की भाँति उमड़ते

शाँति भंग करते

शोर मचाते

मेरे ही अक्स

मेरी ही छाया

सुत और सुता

कहते हुए पिता-पिता

धप्प से गिर पड़े

मेरे ही ऊपर खाट पर

एक छाती तो

दुसरा लात पर

वे चिल्लाते जा रहे थे

शिकवा के अंदाज में

बतियाते जा रहे थे

संगीतमय भरे साज में

परवाह से अति दूर

थकान से अनजान

मासूमियत के सहारे

दोनों बेचारे

एक-दुसरे की

गल्तियां निकालते

अपनी गलती

बिल्कुल भी ना मानते

सतत् बोले जा रहे थे

किन्तु ! नही जानते थे

उनके इस फसाद ने

बेवजह की बात ने

अनचाहे ही सही

मुझे…

अवसाद से

निराशा और हताश से

एकदम

मुक्त कर दिया

मानो…

मुझे बहुत सी ऊर्जा मिल गई हो

जानो…

नई स्फूर्ति का संचार हो गया हो

मैं देख रहा था

अपना बचपन और अपनी छाया

दोनों मासूम

इस सबसे अनजान

बस बोले ही जा रहे थे

शनिवार, 25 फ़रवरी 2012

हरियाणा में पुस्तक मेले का आयोजन

शिक्षा किसी भी राष्ट्र का दर्पण होती है। शिक्षा के कारण ही राष्ट्र उन्नति करते है, सभ्यता की गिनती में आते है तथा अपना श्रेष्ठ निर्माण कर पाते है। आज देश में शिक्षा पर बहुत अधिक प्रयोग किये जा रहे है, कोई भी शिक्षा के मूलभूत अधिकार से वंचित न रह जाये, इस बारे बड़े स्तर पर पहली बार बहुत अधिक सार्थक प्रयास किये जा रहे है। जिसमें हम सबका हरियाणा प्रदेश सबसे आगे बढकर इस पवित्र कार्य को करने के लिए संकल्पबद्ध है। आज एक ओर सरकारी विद्यालयों में कम्यूटर के साथ-साथ प्रोजैक्ट की सुविधा तक दी जा रही है, खेलों का भरपूर सामान दिया जा रहा है, निःशुल्क पुस्तकें दी जा रही है तथा विद्यार्थियों के लिए योगासन, स्वयं सुरक्षा प्रशिक्षण एवं विभिन्न प्रकार के कर के सीखना विधि को अपनाते हुए नए अध्यापकों को इस कार्य के लिए नियुक्त कर ध्यान दिया जा रहा है, यह हरियाणा सरकार का शिक्षा की ज्योत घर-घर जलाकर प्रकाश करने की ओर बढ़ता कदम है। शिक्षा विभाग की और से पिछले वर्ष से ही प्रत्येक जिलें में पुस्तक मेला का आयोजन किया जा रहा है। विद्वानों की कहावत है कि पुस्तक मनुष्य की सबसे श्रेष्ठ मित्र है। किन्तु वर्तमान परिदृश्य में देखा जाये तो पुस्तक पढ़ने की रुचि ही समाप्त होती जा रही है। आज बच्चें से लेकर बूढ़े व्यक्ति तक सभी टी॰वी॰ के आगे बैठकर चैनल बदल-बदलकर ही अपना समय व्यतीत कर लेते है। पुस्तक पढ़ने की वृत्ति का तो मानो लोप ही हो गया हो। पहले धार्मिक पुस्तकों के पढ़ने का चलन था। फिर चिकित्सा सम्बन्धी और कहानियों की पुस्तकों का शौंक बढ़ा, इसके बाद उपन्यास का चलन ऐसा आया कि 300-400 पेज का उपन्यास 2-3 घंटों में पढ़कर रख देते थे और जब तक उपन्यास पूरा न पढ़ा जाये तब तक ना खाने की और ना सोने की होश रहती थी। किन्तु टीवी चैनलस् ने तो जैसे पुस्तक मार्कीट से समाप्त ही कर दी है। जिसे देखों केबलस् या डिश् का कनैक्शन लेकर ज्यों ही खाली समय मिलता है, पूरा-पूरा दिन व्यर्थ गवां देते है रिमोट से चैनलस् बदलते हुये। पुस्तक पढ़ने का चलन जब दम तोड़ने के कगार पर खड़ा है, ऐसे समय में शिक्षा विभाग ने पुस्तक मेले का आयोजन कर फिर से इस श्रेष्ठ वृत्ति को जागृत करने का कार्य किया है। जो पुस्तक आज मार्किट से लुप्त हो गई है, ढूँढ़े से भी नहीं मिलती। वह पुस्तक बड़ी आसानी से पुस्तक मेले में उपलब्ध हो जाती है। भारत राष्ट्र की संस्कृति कुछ हद तक इस पठन-पाठन के कारण ही असंख्य वर्षों से सत्य-धर्म की ज्योत जलाने का आज भी बहुत ही सम्मान के साथ श्रेयस्कर कार्य कर रही है। कई बार एक पुस्तक ही व्यक्ति के जीवन की धारा को बदल देती है। पुस्तक में उन रचनाकारों की रचनाओं को संकलित किया जाता है जो अपनी कलम की शक्ति से समय की धारा को मोड़ने का साहस रखता हो, या फिर सत्य लिखने की हिम्मत कर सकता हो अथवा जिन्होंने अपनी लेखनी से ज्ञान की वर्षा की हो और जो तनाव भरे जीवन में आंतरिक प्रसन्नता उत्पन्न करने की विधा जानता हो। व्यक्ति के विचार ही उसे महान या निकृष्ट बनाते है और साहित्य पढ़ने से ही विचार प्रभावित होते हैं। पुस्तकों के माध्यम से हम उन व्यक्तियों के जीवन से परीचित होते है जिन्होंने इस विश्व में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हो और उनका जीवन परिचय हम सबको उत्साहित करने का कार्य सफलतापूर्वक कर पाता है। कितने ही ज्ञान के भंडार पुस्तकों के इन पृष्ठों में छुपे पड़े हैं। विश्व के कितने ही रहस्य को उद्घाटित करने की क्षमता रखती है ये पुस्तक, हम इसका अनुमान भी नहीं लगा सकते। साहित्यकार सम्राट मुंशी प्रेमचंद ने उपन्यास एवं कहानियों के माध्यम से ही तत्कालीन सामाजिक बुराइयों तथा समस्याओं को इतना मुखर किया कि इन बुराइयों को समाप्त करने के लिए एक वर्ग ही खड़ा हो गया। जो कार्य तलवार नहीं कर सकती वो लेखनी कर जाती है। अतः पुस्तकों का हमारे जीवन में बहुत अधिक महत्व है, और जब यह रुचि समाप्त होने पर है, तब शिक्षा विभाग ने आगे आकर बहुत ही प्रशंसनीय कार्य किया है जो विभाग का कर्त्तव्य भी है। शिक्षा विभाग ने न केवल विद्यार्थियों को ही अच्छी पुस्तक उपलब्ध कराने का कार्य किया है अपितु उन लेखकों एवं प्रकाशकों को भी एक मंच प्रदान किया है जो समाज के द्वारा धीरे-धीरे उपेक्षित हो रहे थे। आज लिखने वाले और पढ़ने वाले बहुत ही कम लोग रह गये हैं। दिल्ली जैसे महानगर में ये पुस्तक मेले बेशक व्यवसाय का खेल बन कर रह जाये किन्तु शिक्षा विभाग के प्रयासों से हमारे अधिकारीगण हरियाणा के हर जिले में लगने वाले निश्चित ही अमूल्य पुस्तक उन विद्यार्थियों के पास पहूँचाने का कार्य कर रहे है जो सचमुच ही भारत के भावी कर्णधार हैं।

रविवार, 28 अगस्त 2011

अग्निवेश देशद्रोही के साथ-साथ जनता का गद्दार निकला

अन्ना के समर्थन में मेरा अग्निवेश को लेकर अनुमान ठीक था कि अन्ना का अनशन इस भेड़िये के कारण संदेहस्पद लग रहा था। अब स्पष्ट हो गया कि अनशन तो सच्चा था किन्तु ये भेड़िया अग्निवेश देशद्रोही के साथ-साथ जनता का गद्दार निकला। आश्चर्य तो इस बात का है कि अन्ना टीम इतनी सुलझी हुई एवं अनुभवी है फिर अग्निवेश को अपना सदस्य कैसे बना लिया।

ये आरक्षण देश को निगल रहा है

ये आरक्षण देश को निगल रहा है----------- मैं शतप्रतिशत आरक्षण के विरोध में हूँ किन्तु आरक्षित श्रेणी के कदापि नहीं। आरक्षण आपसी प्रेम, भाईचारे को समाप्त कर रहा है, योग्यता को निराशा में धकेल रहा है, गुणवत्ता में अड़चन डाल रहा है। यदि बीपीएल को निष्पक्ष रुप में स्वीकार किया जाए तो क्या सभी जातियों को लाभ नही मिलेगा। आज संसद में स्वयं को घॉघ समझने वाले नेताओं ने जनलोकपाल बिल में भी दलित के लिए जगह देने की बात की । ये बताए कि क्या भ्रष्टाचार जाति धर्म पूछ कर किया जाता है।

रविवार, 14 अगस्त 2011

आजादी

आजादी

आजादी

तीन अक्षरों का मेल है

इसके बिना तो

घर में भी जेल है

आजादी

प्रतिक्षा है

जंजीरों की खनखनाहट से

छुटकारा पाने की

खुले गगन में साँस लेने की

आजादी

प्रतिष्ठा है

आत्मा की

पूर्वजों के सपनों की

और मानवता की

आजादी

चाह है

किसी को चाहने की

मिलकर कदम बढ़ाने की

आजादी

सपना है

कैद में रहने वालों का

घर में अस्सी पार कर चुके

बूढ़ी आँखों का

आजादी

अवसर है

गल्तियाँ सुधारने का

सीखने और सीखाने का

आजादी

खेल है

दानवता का

मानवता को

तहस नहस करने वालों का

गुरुवार, 4 अगस्त 2011

युवा संन्यासी / दिल्ली का श्वेत-रक्त

युवा संन्यासी

उठ भारत के सुप्त सिपाही, युवा संन्यासी आए हैं।
चिरनिद्रा से तुझे जगाकर, नवचेतना लाए हैं।

रामकृष्ण परमहंस सरीखे, संतों की ये बात करें।
नरेन्द्र को विवेकानन्द बनाने, का ये भी प्रयास करें।

कंटक-पथ पर तुम भी बढ़कर, ज्ञान की ज्योति जलाओगे।
इस आशा से तुम्हें जगाकर, इतिहास दोहराने आए हैं।

उठ भारत के सुप्त सिपाही, युवा संन्यासी आए हैं।
चिरनिद्रा से तुझे जगाकर, नवचेतना लाए हैं।

इनके मुख में रामदास और रामतीर्थ की वाणी है।
इच्छा तेरी वीर शिवा सी, संतों ने पहचानी है।

अफजलखाँ और शाइस्ताखाँ को, देश निकाला देना है।
धर्म स्थापना कैसे होगी, यह समझाने आए हैं।

उठ भारत के सुप्त सिपाही, युवा संन्यासी आए हैं।
चिरनिद्रा से तुझे जगाकर, नवचेतना लाए हैं।

चाणक्य-विदुर को ठुकराकर, शकुनि से मेल बढ़ाते जो।
जाति-पंथों के नाम पर, आपस में लड़वाते जो।

इन देशद्रोही जहरीले नागों से, बचके रहना हे नवयुवक।
तेरे अन्तर्मन में बसकर, तुझे जगाने आए हैं।

उठ भारत के सुप्त सिपाही, युवा संन्यासी आए हैं।
चिरनिद्रा से तुझे जगाकर, नवचेतना लाए हैं।

याद करो तुम ऋषि अरविन्द की, क्रान्ति-शोलों की गाथा।
बिस्मिल, सुभाष, आजाद, भगत का भारत माता से नाता।

सन् ६२, ६५ और ७१ के, योद्धाओं रणबाँकुरों को।
कारगिल में टाइगर हिल पर तिरंगे की, स्मृति दिलाने आए हैं।

उठ भारत के सुप्त सिपाही, युवा संन्यासी आए हैं।
चिरनिद्रा से तुझे जगाकर, नवचेतना लाए हैं।

फिर से खड़ा हुआ हिमालय, युवा संत के स्वागत को।
सागर की लहरें बढ़ती है, छूने जिनके चरणों को।

योगध्वज को लहराते, वाणी में अग्नि शोलों से।
ऋषि-मुनि के वंशज देखो, तुम्हें बताने आए हैं।

उठ भारत के सुप्त सिपाही, युवा संन्यासी आए हैं।
चिरनिद्रा से तुझे जगाकर, नवचेतना लाए हैं।

राणा की जंगल की रोटी, रानी के दत्तक बेटे को।
बन्दा की घायल आँखें और, गोविन्द के चारों बेटों को।

उठकर देखो तुम अपने, महापुरुषों को भूले बैठे हो।
इन अक्षम्य अपराधों से, तुम्हें बचाने आए हैं।

उठ भारत के सुप्त सिपाही, युवा संन्यासी आए हैं।
चिरनिद्रा से तुझे जगाकर, नवचेतना लाए हैं।

दिल्ली का श्वेत-रक्त

रक्त-श्वेत हुआ दिल्ली का,
नहीं जानती पीरपराई।
शहरी कदम अनदेखा करते,
निर्धन करता कैसे कमाई।
वो क्या जाने कैसे होगी,
उदराग्नि की लपटें शाँत।
निर्धन निर्धनता को बढ़ रहा,
गाँव-गाँव और प्राँत-प्राँत।
आँकड़ों में चिल्लाती दिल्ली,
जे॰ डी॰ पी॰ की दर चमक लाई।
अरे! ग्रामीण महिला को देखो,
तन पर फटी धोती आई।
एक धोती के दो हिस्से कर,
माँ-बेटी ने ढका है तन।
दिल्ली तुझको लाज न आती,
कब पिघलेगा तेरा मन।
जनता से तो तू नहीं डरती,
जनता की आह से डर।
या तो उनकी सुध ले ले,
अन्यथा नष्ट हो जाएगा तेरा घर।
अनिच्छा से ही शहरी सीमा,
लांघ के कभी तो गाँव में आ।
भूखे-बिलखते बूढ़े-बच्चे,
दिल्ली दो रोटी तो ला।

तेरे सिंहासन की चारों टाँगे,
इनके ही कन्धों पर है।
फिर भी आँकड़ों की क्रीड़ा में,
निर्धनता हाशिये पर है।

नर-नारायण होते ईश्वर,
स्वच्छ हृदय में वास करें।
सुन ले सदा को इनकी दिल्ली,
तुझसे कुछ ये आस करें।

सदियों से ये लड़ते आए,
निर्धनता से दीर्घ लड़ाई।
समान विकास हो देश का दिल्ली,
अब तो पाट दो ये खाई।

उमेश प्रताप वत्स

बरखा री बरखा, बरखा रानी,

n by परिकल्पना संपादकीय टीम | July 16, 2011 | 4


बरखा री बरखा, बरखा रानी,
ओ दीवानी तेरी मधुर कहानी।

धरती से तूने प्रीत बढ़ाई,
तभी बादलो से मुक्त हो आई।
ग्रीष्म ऋतु से झुलसे प्राणी,
प्रतीक्षारत्त सब अधम क्या ज्ञानी।

बादलों की तू महारानी,
इन्द्रसुता तू है मस्तानी।
तेरी रिमझिम बौछारों से,
मिट जाती है सब परेशानी।
बलखाती, अटखेली करती,
निकल पड़ी करने मनमानी।

कहीं गरजती कहीं बरसती,
कहीं बने भीषण तूफानी।
तेरी प्रथम बौछारों से,
सबके चेहरे खिल जाते हैं।
कीट-पतंगे तरूवर प्राणी,
पंछी भी चहचहाते हैं।

बौछारों से आगे चलकर,
क्यों बाढ़ की राह अपनाई।
कदम न ठिठके बरखा तेरे,
क्यों ताण्डव मचा दिया सांई।
बूढ़े बच्चों की चीत्कार,
झोंपड़-पट्टी में हाहाकार।
गाय-भैंसें और वन्य-जीव,
करबद्ध हे ईश रहे पुकार।
मानव को प्रकृति-दोहन की,
मैं मान रहा हूँ यही सजा।
किन्तु निर्धन-निर्दोषों की,
लाचारी को अब न और लजा।

अब शाँत होकर कदम रोक,
फिर अवसर दे अज्ञानी को।
मची त्राहि-त्राहि चारों ओर,
अब रोक ले इस मनमानी को।

मानव तुम भी प्रकृति का,
ये तीव्र दोहन बन्द करो।
बरखा रानी के आँचल में,
फिर से प्रेम-भाव भरो।