बुधवार, 5 मई 2010

‘माँ का दर्द’

और कितना तू सहेगी अपने, सीने पर दर्दे शूल।
अब छोड़ो धैर्य और क्षमा, माँ उठालो शिव का त्रिशूल।।
कितने घाव दिये तुझको, क्या उनका हिसाब नहीं लेगी।
जिसने रोये खूं के आसूं , क्या उनको न्याय नहीं देगी।।
कितने सिन्दूर उजाड़े हैं, कितने आँचल रिक्त किए।
खिलने से पहले शैशव में ही, मैया से बच्चे जुदा किए।।
इतने अत्याचारों को,तेरे इन गद्दारों को, माँ हम कैसे जाए भूल।
अब छोडो धैर्य और क्षमा, माँ उठालो शिव का त्रिशूल।। १।।
दिल्ली दहली, जयपुर दहला, अहमदाबाद बर्बाद हुआ।
मुम्बई के सिरमौर ताज पर, आंतकियों का नाद हुआ।।
पर तेरे खादी-कुपुत्रों को, ये नाद सुनाई नहीं देता।
तुष्टीकरण की नीति मे, सत्यानाश दिखाई नहीं देता।।
अपनी कुर्सी बचाने को, जातिवाद को दे रहे तूल।
अब छोड़ो धैर्य और क्षमा, माँ उठालो शिव का त्रिशूल।।२।।
तेरा ही अन्न-जल लेकर के, तुझपे ही करते घात मॉं।
वोटो की खातिर निज बिकते, देश का सौदा करते मॉं।।
इन खादी पहने गुण्डों को, कायरता के झुण्डों को।
आंतकवादियों के रखवाले, राक्षस बने चण्ड-मुण्डों को।।
अब दिखला दे गद्दारों को, अपना प्रचण्ड विकराल रुप।
अब छोड़ो धैर्य और क्षमा, माँ उठालो शिव का त्रिशूल।। ३।।
गौरी,गजनी,बाबर,खिलजी,औरंगजेब की खूनी तलवार।
सांसे गिरवी पडी हुई थी, हुक्मरानों के खूनी दरबार।।
तब तेरी ही माटी के लालों ने, चौहान, शिवा, राणा के भालों ने।
जब हुंकार भरी मतवालों ने, गोविन्द के चारों लालों ने।।
उन वीरों के बलिदानों से, बची रही संस्कृति मूल।
अब छोडो धैर्य और क्षमा, माँ उठालो शिव का त्रिशूल।।४।।
माँ तेरी लाज बचाने को , तेरे सपूत बलिदान हुए।
ओबराय,ताज,नरीमन-हाउस पर,मार्कोस कमाण्डो कूद गए।।
ऍनऍसजी के रणबांकुरे, एटीऍस के वीर जंग लड़े।
आंतकवादियों के जबड़ो में, हाथ डाल आगे बढे।।
पर तब भी खादी फिल्मी रथ पर, थी ताज मे रही झूल।
अब छोड़ो धैर्य और क्षमा, माँ उठालो शिव का त्रिशूल।।५।।
अब मिलकर शंख बजाना होगा, राष्ट्र-भक्ति के स्वर लेकर।
भारत माता के उद्घोष से, बढ़-चले तन-मन-धन देकर।।
गाँव-गाँव और शहर-नगर में, राष्ट्रवाद की पौध लगे।
चाहे रक्त से हो सिञ्चन इसका, दोगुणी शक्ति से फूले-फले।।
होगा सहन नहीं आंतक का ताण्डव, अब न करे कोई ऐसी भूल।
अब छोडो धैर्य और क्षमा, माँ उठालो शिव का त्रिशूल।। ६।।

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2010

कविता- ‘प्रकृति की छाया’

मैं जब भी उदास होता हूँ , तेरी छाया में चैन मिलता हैं।
जब कहीं न सुलझ पाऊँ प्रभू , तू ही मेरे मन की सुनता हैं।।

कहते है मानव बढ़ रहा है , विकास की अंधी दौड में।
क्या ठीक क्या गलत छोड़ इसे , भौतिकता की होड़ में।।

अपने ही हाथों अपनो को , राह में पछाड़ रहा।
आगे बढते-बढते पीछे , क्या हो रहा अनजान रहा।। १।।

मानव की ताल चॉंद पर , अब कदम बढाया मंगल पर।
किंतु प्रकृति के बिना रहना , नर्क हो जाएं धरती पर ।।

फिर क्यूँ ढोल पीट रहा है , अपने बढते कदमों से ।
क्या प्रकृति से आगे निकल सकता है , अपने धुंधले कर्मों से ।। २ ।।

यह सत्य है आज भी मानव , भ्रमण करता प्रकृति का ।
चाहे समुद्र तट हो, द्वीप समूह , विचरण करता सृष्टि का ।।

किंतु कुछ सिरफिरे लोगो ने , ईश्वर से आगे सोची है।
प्रकृति का दोहन कर करके , सारी वसुन्धरा नोची है ।। ३ ।।

वन्य प्राणी हो चाहे बाज गिद, लुप्त होते जा रहे ।
जोहड, कूप, ताल, तलैया, ढूंढे से भी नहीं पा रहे ।।

आसमां से ऊँची चिमनी , बेहाल कर रही मानव को ।
गंदे नाले -कारखाने , दूषित करते गंगा जल को।। ४।।

अब तो सद्बुधि दे दो भगवन ,मैं बढ चलूं सत्य की खोज में।
मोह-माया, लोभ-क्रोध छोड इसे, दुलार पाऊँ तेरी गोद में ।।

प्रकृति का मैं शोषक नहीं , पोषक बन आभार दूँ ।
सच्ची शान्ति,आनन्दपथ पर, जग को संग ले आगे बढूं।। ५ ।।

मंगलवार, 26 जनवरी 2010

चिट्ठाजगत को उमेश का प्रणाम, मेरी पहली पोस्ट

नमस्कार, मेरा नाम उमेश प्रताप वत्स है। मैं यमुनानगर का निवासी हूँ तथा हरियाणा शिक्षा विभाग में हिन्दी अध्यापक के रुप में कार्यरत हूँ। मैं ई-पण्डित श्रीश शर्मा के साथ एक ही विद्यालय में कार्यरत हूँ, हिन्दी भाषायी लेखन में रुचि रखता हूँ तो उन्होंने प्रेरित किया कि चिट्ठा लिखा करुँ। ब्लॉग वगैरा सैट करने में उन्होंने सहायता की।

ब्लॉग का नाम उन्होंने ही सुझाया, नाम के पीछे यह तथ्य है कि स्कूल में साथी अध्यापक मुझे पहलवान कहते हैं (मैं कुश्ती का राष्ट्रीय चैम्पियन रह चुका हूँ)।
उन्होंने बताया कि कविता, कहानी एवं अन्य विचार आदि लिखने के लिये ब्लॉग एक उत्तम माध्यम है। आशा है आप सब का सहयोग मिलेगा। हिन्दी टाइप करने में अभी गति नहीं है इसलिये आज इतना ही।