रविवार, 13 अगस्त 2023

आलेख - मणिपुर के बाद हरियाणा में भी दंगों का नैरेटिव सैट किया जा रहा है

 आलेख - मणिपुर के बाद हरियाणा में भी दंगों का नैरेटिव सैट किया जा रहा है 

- डॉ उमेश प्रताप वत्स 


पिछले काफी समय से कानूनी रूप से शांत चल रहे हरियाणा में भी मणीपुर हिंसा का अध्याय दोहराने का कुत्सित प्रयास किया जा रहा है। पशु तस्करों के लिए स्वर्ग कहे जाने वाले मेवात-नूंह क्षेत्र में हिंसा का यह अभी तक मिली जानकारी के अनुसार प्रायोजित कांड प्रदर्शित हो रहा है जिस पर धडल्ले से मीडिया ट्रैल भी चल रहा है।

आधी-अधूरी जानकारी के साथ मीडिया कर्मी चीख-चीखकर आक्रोशित मुद्रा में यह बताने का प्रयास कर रहे हैं कि दो समुदाय में आपसी भिडंत हुई जिसमें 70 से भी ज्यादा लोग घायल हो गए हैं। बहुत ही सिद्धस्थता से प्रायोजित हमला करने व कराने वालों का नाम छिपाया जा रहा है और आम भक्त समाज को हर वाक्य में बजरंग दल व विश्व हिन्दू परिषद के कार्यकर्ता बताकर नैरेटिव सैट किया जा रहा है। इस सैट नैरेटिव का सीधा-सीधा अर्थ है कि बजरंग दल के लोग शोभायात्रा निकाल रहे थे जिसमें मोनू को आमंत्रित किया गया था जिसकी भनक लगते ही दूसरे समुदाय के लोग भड़क गए, दोनों ओर से पत्थरबाजी हुई जिसमें दो सुरक्षाकर्मी मारे गए व एक सामान्य व्यक्ति। अब यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि नैरेटिव कैसे सैट किया गया है । पहले नैरेटिव के अंतर्गत आम स्थानीय जन समाज श्रावण मास के चलते निकट प्रसिद्ध शिव मंदिर पर जल चढ़ाने शोभायात्रा के रूप में जा रहे थे जिसमें शिव शंकर में आस्था रखने वाले सभी हिंदू भक्त समाज भाग ले रहे थे। उन भक्तों में निश्चित ही बजरंग दल के कार्यकर्ता व विश्व हिन्दू परिषद के कार्यकर्ता भी होंगे क्योंकि वे भी शिव के भक्त है कोई आतंकी तो नहीं जबकि बताया गया कि बजरंग दल व विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ता शिवलिंग का जलाभिषेक करने के लिए शोभायात्रा के रूप में जा रहे थे। ताकि आम समाज में यह संदेश जाये कि शोभायात्रा में आम जन समाज न होकर संघ के कार्यकर्ता थे जिन्होंने दूसरे समुदाय को हमला करने पर विवश कर दिया।

दूसरा नैरेटिव सैट किया गया कि अन्य समुदाय ने मोनू के निमंत्रण पर नाराज़ होकर विरोध किया। पहली बात इसकी अभी तक कोई जानकारी नहीं मिली कि मोनू इस शोभायात्रा में भाग ले रहा था।दूसरा मोनू के नेतृत्व में कार्यक्रम का आयोजन नहीं हो रहा था। तीसरा आम समाज को निशाना बनाने की बजाय मोनू के विरुध्द व्यक्तिगत शिकायत की जा सकती थी। चौथा मोनू कोई आतंकवादी नहीं अपितु रात-दिन पुलिस की नाक के नीचे खुलेआम गौकशी करने वाले राक्षसों की हत्या का आरोपी है जो कि अभी तक कोर्ट में साबित भी नहीं हुआ है। पाँचवा यह दूसरा समुदाय क्या है ? पारसी ,चीनी ,जापानी , इसाई , सिख , जैन ,बौद्ध या अफ्रीकन । मुस्लिम समुदाय कहने में क्या इन एंकरों के मुँह में दही जम जाती है । जब आप आम समाज को तो बार-बार बजरंग दल के कार्यकर्ता कहकर झूठ परोस रहे हो तो क्या सीधा स्पष्ट मुस्लिम समुदाय सत्य बोलने में कोई विवशता है अथवा षड्यंत्र?

तीसरा नैरेटिव सैट किया गया कि भीड़ द्वारा की गई हिंसा में दो सुरक्षा कर्मी व एक आम व्यक्ति मारा गया जो बाद में बढ़कर 6 तक बतायें जा रहे हैं। भीड़ की हिंसा बताने की बजाय यह क्यों नहीं कहा गया कि जब प्रायोजित हिंसा को रोकने के लिए पुलिस ने प्रयास किया तो आक्रमणकारियों ने उन्हें भी नहीं बख्शा तथा उनके साथ एक शिवभक्त को भी मौत के घाट उतार दिया। भीड़ में तो यह भी क्या लगाया जा सकता है कि शोभायात्रा वालों ने ही सभी हत्याएं की होंगी।

मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है।जो बिना डरे बिना रुके बिना लोभ-लालच के जनता तक केवल सत्य पहुँचाता है किंतु यहां तो मीडिया स्वयं विरोधी पक्ष की भूमिका में खड़ा हो जाता है। ऐसा तो कभी नहीं माना जा सकता कि जो सरकार के साथ है वह गलत है और जो विपक्ष के साथ है वह सहानुभूति का पात्र? यह भी सही नहीं है कि जो बहू संख्यक है वह सदा से गलत है और जो अल्पसंख्यक है वह सब शांतिदूत हैं।

अभी देश मणिपुर हिंसा के शोर-शराबे से बाहर भी नहीं निकला था कि अब रात-दिन टीवी पर हिंसा-हिंसा सुनकर नकारात्मकता के शिखर की ओर बढ़ रहा है। 

उल्लेखनीय है कि हरियाणा के मेवात-नूंह इलाके में सोमवार को स्थानीय शिवभक्तों की शोभायात्रा निकालने के दौरान मुस्लिम समाज के कुछ हिंसक प्रवृत्ति के लोगों ने शोभायात्रा पर प्रायोजित हमला किया जिसमें दो होमगार्ड सहित 6 लोगों की मौत हो गई। मेवात में हिंसा को लेकर 26 FIR दर्ज की गई हैं। जबकि 116 लोगों को गिरफ्तार भी किया गया है।

दरअसल, नूंह में हिंदू संगठनों ने आम समाज की अनुशंसा पर प्रतिवर्ष की भांति इस बार भी बृजमंडल यात्रा निकालने का आह्वान किया था। प्रशासन से इसकी वैधानिक रूप से स्वीकृति भी ली गई थी। जब सोमवार को शोभायात्रा मंदिर के पास पहुँचने वाली थी तभी पूर्ण रूप से फुल तैयारी के साथ बैठे हुए मुस्लिम समुदाय के लोगों ने इस यात्रा पर पथराव कर दिया। देखते ही देखते यह हिंसा में बदल गया। सैकड़ों कारों को आग लगा दी गई। साइबर थाने पर भी हमला किया गया। फायरिंग भी हुई। पुलिस पर भी हमला हुआ। विचारणीय प्रश्न यह है कि अचानक बारूद , बंदूकें , गोलियां , डंडे-पत्थर ये सब एक दम कहां से आ गये।

नूंह के बाद सोहना में भी पथराव और फायरिंग हुई। आम समाज के सैकड़ों वाहनों को आग के हवाले कर दिया गया। पता नहीं कैसे एक व्यक्ति अपनी कमाई से गाड़ी खरीद पाता है किंतु ये निर्दयी बहशी लोग उसके सपनों को क्षणभर में आग में झौंक देते हैं।

बजरंग दल ने हिंसा के विरोध में आज देशव्यापी प्रदर्शन बुलाया है। इसका असर जम्मू से लेकर दिल्ली-यूपी तक देखने को मिल रहा है। दिल्ली में बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने बदरपुर बॉर्डर जाम कर दिया। उधर, यूपी के संभल और सहारनपुर, मध्यप्रदेश के भोपाल समेत कई शहरों में भी बजरंग दल ने विरोध प्रदर्शन किया। आम हिंदू समाज भी मीडिया ट्रोल व मुस्लिम समुदाय के कुछ हिंसक लोगों द्वारा की गई इस घटना से आक्रोशित हैं और वे शांतिमार्च निकालकर लगभग प्रत्येक जिले में नूंह की इस वीभत्स घटना के विरोध में राष्ट्रपति के नाम जिला उपायुक्तों को ज्ञापन दे रहे हैं ताकि इन मानवता के दुश्मनों के विरुध्द सख्त से सख्त कार्रवाई की जाये तथा इनकी संपत्ति कुर्क कर पीड़ितों को मुआवजा दिया जाए।

आज चौथे दिन एक भी बयानवीर , काली पोशाक वाला , मणिपुर मुद्दे पर पूरे देश की गति रोक देने वाले अभी तक भी इन शिवभक्तों के आँसू पौंछने नहीं निकले। ना कोई माँ-माटी-मानुष की बात कर रहा है ना कोई भक्ति के रस में डूबे , झूमते हुए भक्तों पर अचानक हमले से फैली हिंसा पर बयान दे रहा है ,ना कोई किसी भक्त के घर ढांढस बंधाने गया। यह कैसी राजनीति है? यह कैसा दोगलापन है ? यह कैसा नैरेटिव सैट किया जा रहा है। मुझे लगता है कि नैरेटिव स्पष्ट है , दंगे कराओ , दंगाइयों को प्रोत्साहित करो, उनकी हर संभव मदद करो, जान-माल का अधिक से अधिक नुकसान करवाओ फिर सत्तासीन पार्टी को कोसना शुरु कर दो ताकि लोगों में यह संदेश जाये कि सरकार की नाक के नीचे दंग हो रहे हैं और सरकार को इसका कोई फर्क नहीं पड़ता । सरकार दंगे रोकने में विफल है आदि आदि। वोट बैंक के लिए यह बहुत ही खतरनाक मानसिकता है।

हमला करने वाले मुस्लिम समुदाय के लोग हो सकते हैं किंतु हमला कराने वालों का कोई समुदाय नहीं है। वे लाश पर हाथ सेंकने वाले बहुत ही खतरनाक लोग है। वही लोग ए सी की ढंडी हवा में बैठकर देश विरोधी नैरेटिव सैट करते हैं। हिंदू समाज के लोग क्लीयर है जो धर्म अथवा संस्कृति के विरुध्द कार्य करेगा वे उसके विरुद्ध है फिर वह चाहे कोई हिंदू संत हो , चाहे अपना ही मनोज मुन्ताशिर हो या घर का व्यक्ति। जबकि राष्ट्र विरोधी गुट का कोई विचार , कोई सिद्धांत क्लीयर नहीं है। वे मौकापरस्त है , समय के अनुकूल रंग बदलते हैं । वे जाति-धर्म क्या राष्ट्र को भी अपने स्वार्थ के लिए ध्वस्त करने को तत्पर रहते हैं। मीडिया का एक वर्ग उन्हें प्रोत्साहित करता है तथा उनकी वास्तविकता छिपाने का भयानक अपराध करता है।

2024 के चुनाव निकट है। देश की जनता को अभी कई मणिपुर , कई मेवात-नूंह जैसे प्रायोजित घटनाक्रम देखने के लिए तैयार रहना होगा क्योंकि ये लोग वर्तमान सरकार को अपदस्थ करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। ये बहुत ही शातिर , खतरनाक मानसिकता के लोग हैं। इनकी कोई जाति कोई धर्म कोई समुदाय नहीं है। ये जाति को जाति से , एक धर्म को दूसरे धर्म से तथा बहू संख्यक पर दबाव बनाने के लिए कुछ अल्पसंख्यकों की अल्पबुद्धि का लाभ उठाते हुए अपनी सत्ता के लिए देश को गर्त में भी उतार सकते हैं।

अभी नूंह में कर्फ्यू लगा दिया गया है । हिंसा पर काबू पाने के लिए अर्धसैनिक बलों की 20 टुकड़ियों को तैनात किया गया है। नूंह, पलवल, मानेसर, सोहाना और पटौदी में इंटरनेट बंद कर दिया गया। सरकार अब स्थिति को नियंत्रण में बता रही है जबकि हिंदू समाज को रोष इस बात को लेकर है कि प्रत्येक घटनाओं में पहले ये लोग हम पर हमला कर देते हैं और जब प्रतिक्रिया होने लगती है तो स्थिति को नियंत्रण में करने के लिए अतिरिक्त सुरक्षा बलों की कंपनियां आ जाती है। आर ए एफ ने कई जगहों पर फ्लैग मार्च निकाला।

मेवात में जिस तरह से पिछले कई वर्षों से मुस्लिम समुदाय की ओर से एक से बढ़कर एक वारदात की गई और सजा मिलने की बजाय राजनैतिक संरक्षण मिला, उससे उनका हौंसला बहुत बढ़ गया है। यहां आये दिन लव जेहाद के मामले , अवैध कब्जे , बेधड़क खनन के मामले , कानून को हाथ में लेने के मामले, लड़कियों को छेड़ने के मामले और विरोध करने पर हत्या तक कर देना , यह प्रतिदिन की बात हो गई है। नूंह की घटना कोई नई बात नहीं है ,इनका पिछला रिकॉर्ड ओर भी खतरनाक है।


28 मार्च 2018 को जब पुलिस वांछित एटीएम लुटेरे रफीक उर्फ ​​​​बच्ची को गिरफ्तार करने के लिए राहड़ी गांव पहुंची तो राहड़ी के 100 से अधिक की संख्या में ग्रामीणों द्वारा कथित तौर पर पुलिस पर पत्थरों से हमला किए जाने के बाद 13 पुलिसकर्मी घायल हो गए थे । इसी तरह 9 मई मेवात के घाटा शमसाबाद के 70 ग्रामीणों ने पुलिस पर उस समय हमला कर दिया जब वे कुख्यात एटीएम चोर साहिद को पकड़ने गए। ग्रामीण अपराधी को छुड़ाने में कामयाब रहे। 7 अगस्त को मेवात में ग्रामीणों ने वांछित अपराधी शब्बीर को पकड़ने के लिए चलाए गए अभियान के दौरान पुलिस पर हमला कर दिया , जिसमें एक युवक की मौत हो गई। मौत का कारण अभी भी स्पष्ट नहीं हो पाया है। ये तीनों मामले 2018 के हैं। गांवों में भारी संख्या में मुस्लिम हैं और यह समुदाय मेवात क्षेत्र पर हावी है जो हरियाणा और राजस्थान के सीमावर्ती क्षेत्र पर अपना नशे व सट्टे का धडल्ले से कारोबार करता है। वैसे भी राजस्थान के अलवर सहित मेवात का पूरा क्षेत्र पशु तस्करी गिरोहों का गढ़ बना हुआ है। जब भी इन पर कार्रवाई करने की कोशिश होती है तो सारा धर्म निरपेक्ष समाज इन अधर्मियों की सुरक्षा में आगे आ जाता है। इनकी अपराधिक प्रवृत्ति, अपराधिक शक्ति के चलते ही राष्ट्र विरोधी हर राजनैतिक दल इनसे निकटता बढ़ाने का प्रयत्न करता है। आखिर कब तक ये हमलों के मास्टर माइंड आम जन समाज के साथ ख़िलवाड़ करते रहेंगे। कब तक वोटों के लिए ये हिंसात्मक घटनाओं को अंजाम देते रहेंगे। आम समाज को भी अब आगे आकर इनके सैट नैरेटिव को समझना होगा।


 स्तंभकार

डॉ उमेश प्रताप वत्स

 लेखक : प्रसिद्ध कथाकार, कवि एवं स्तंभकार है ।

umeshpvats@gmail.com


आलेख - नूंह हिंसा के बाद उठा यह सवाल कि बड़ा अपराधी कौन हिंसा करने वाला या कराने वाला

 आलेख - नूंह हिंसा के बाद उठा यह सवाल कि बड़ा अपराधी कौन हिंसा करने वाला या कराने वाला

- डॉ उमेश प्रताप वत्स 


नूंह की बहुत ही भयावह प्रायोजित हिंसा निसंदेह अब शांत है किंतु हिंसा के अवशेष चीख-चीखकर हिंसा की निर्दयता , भयावहता का बखान कर रहे हैं। आम समाज ने प्रशासनिक कार्रवाई के बाद राहत की सांस ली होगी किंतु जिनका घरबार-परिवार तथा कारोबार सब इस हिंसा के तांडव में लुट चुका वे कभी इस घटना को भुला नहीं पायेंगे ।

हरियाणा सरकार ने भारी दबाव के बाद अपराधी लोगों पर तथा उनकी संपत्ति पर सख्त कार्रवाई प्रारंभ की है। गृहमंत्री अनिल विज इस घटना के बाद गुस्से में है उन्होंने घटना की सूचना देर से सही मिलते ही वहां फोर्स तैनात कर दी है । हिंदु समुदाय के भुक्तभोगी लोगों की पुकार सुन हरियाणा सरकार ने योगी का बुलडोजर भी इस क्षेत्र के माफियाओं के अवैध निर्माण व संपत्ति नष्ट करने के लिए वहां घटना स्थल पर भेज दिये हैं जिनकी कार्रवाई से उत्तरप्रदेश , मध्यप्रदेश, आसाम के बाद हरियाणा भी इस सूची में नामांकित हो गया है ।

आश्चर्य इस बात का है कि हमेशा की तरह अर्बन नक्सलियों के गिरोह से कुछ बुद्धिजीवी बुलडोजर की कार्रवाई को रोकने के लिए उच्च न्यायालय तक पहुंच गये तथा आइ.एन.डी.आइ.ए तथाकथित स्वयं को इंडिया कहने वाले गठबंधन की कुछ नामी पार्टियां दोषियों के व उनकी अवैध संपत्ति को बचाने हेतु संरक्षण में खड़ी हो गई है। क्यों ये लोग बार-बार धर्म विरोधी , हिंदू विरोधी अथवा देश विरोधी लोगों के संरक्षण में खुलकर सामने आ जाती है । क्यों पूरे परिदृश्य को बदलने के लिए बार-बार विमर्श बदले जाते हैं । क्यों पीड़ित हिंदू समाज पर ही उकसाने का आरोप लगाया जा रहा है ? क्यों मोनू मानेसर को ढाल बनाया जा रहा है ? क्यों वहशी-दरिन्दों को बचाने के प्रयास हो रहे हैं । भोले-भाले शिवभक्तों की बजाय दोषियों से हमदर्दी करने वालों की यह कौन-सी मानसिकता है। क्या दोष था उन निरपराध लोगों का जिन्हें गाड़ी सहित जिंदा जलाने की कौशिश की गई । क्या अपराध था उन लोगों का जिनकी सैंकड़ों खड़ी गाड़ियां फूंक दी गई । क्या बिगाड़ा था उन निर्दोष लोगों ने जिनकी जीवन-भर की पूंजी उनकी दुकाने आग के हवाले कर दी गई। इनका दोष इतना ही था कि ये किसी भी खतरे से अनजान उस जलाभिषेक यात्रा में शामिल थे जो नल्हर महादेव मंदिर से निकलकर फिरोजपुर झिरका तक जाने वाली थी। किसी ने सोचा भी नहीं था कि तीन ओर से अरावली पहाडियों की सावन माह की हरी-भरी ऊंचाइयों से घिरे भव्य शिवमंदिर के चारों ओर शांत घाटी में तथाकथित शांतिदूतों की भीड़ हिंसा का तांडव मचा देगी। 

जो लोग बजरंग दल या मोनू मानेसर द्वारा उकसाने की घटना कहकर नैरेटिव सैट करने में लगे हैं , वे बताएं कि क्या उकसाने की घटना में अचानक हजारों लोग पेट्रोल बम लेकर आ जाते हैं , क्या बिना पूर्व तैयारी के बंदूकें ,गोलियां, पिस्टल ,बारूद उपलब्ध हो जाते हैं । क्या प्रोफेशनल अपराधियों व गुंडा तत्वों की तरह सैंकडों गाड़ियों को इस तरह जला देते हैं कि मिनटों में ही वह लोहे का ढांचा मात्र रह जाये। क्या पुलिस के ऑफिस , साइबर थाने को ही जला डालते हैं ? आस-पास मुस्लिम लोग भी नहीं रहते तो कहां से आ गई यह हजारों की भीड़। किसी धार्मिक मामलें की हिंसा में साइबर थाने में रखा रिकॉर्ड जलाने का क्या उद्देश्य हो सकता है। नूंह से बीस किलोमीटर दूर बड़कली में केवल हिंदू समुदाय की लगभग 25 दूकानें जलाने का क्या अर्थ है ? स्थानीय भाजपा नेताओं के घर व व्यवसायिक केंद्रों के जलाने के पीछे कौन सी उत्तेजना काम कर रही थी। एक गरीब लड़के अभिषेक को जो कि पास के गाँव में बहुत ही निर्धन परिवार से था , घेरकर निर्दयता से मौत के घाट उतार देना कौन सी उत्तेजित कर देने वाली घटना का परिणाम है। किस उकसाने वाली घटना के बाद पत्थरों से भरे डंपर के डंपर तिमंजिला भवनों की छतों पर पहुंच जाते हैं । 

वास्तव में नूंह की घटना कोई सामान्य घटना नहीं थी और ना ही किसी उकसाने का परिणाम थी। भाजपा , बजरंग दल , मोनू मानेसर आदि के नाम से यह नैरेटिव सैट करने का प्रयास किया जा रहा है कि हमला करने वाले हमला करने को विवश हो गए थे क्योंकि उनको हमला करने के लिए हिंदू समुदाय के लोगों ने विवश कर दिया था । 

नूंह की इस वीभत्स घटना के तार राजस्थान के विधानसभा चुनाव व 2024 के केंद्र सरकार के चुनाव से जुड़ते दिखाई देते हैं । इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि इस घटना की पूर्व तैयारी राजस्थान में राजनैतिक संरक्षण में बैठकर तैयार की गई हो। इस बात को भी नहीं नकारा जा सकता कि घटना को अंजाम देने वाले लोग पड़ोसी राज्यों से बुलायें गए हो ताकि उनकी पहचान न हो सके और बलि का बकरा स्थानीय लोगों को बना दिया हो ।

इसे भी अनदेखा नहीं किया जा सकता कि राजस्थान के अलवर से सटी पहाड़ियों से गोली-बारूद चलाने वाले राजस्थान के मुस्लिम समुदाय के लोग हो। 

यह संभव है कि हरियाणा से बाहर के लोगों ने स्थानीय लोगों का सहयोग लेकर कई महीने से इस घटना की पूर्व तैयारी की। घटना में मोर्चे बनाएं गए , कौन किस मोर्चे को संभालेगा यह तय कर बकायदा उनको प्रशिक्षण दिया गया। पेट्रोल बम फेंकने के लिए मुस्लिम समुदाय के लड़कों को प्रशिक्षित किया गया। पत्थर कहां से कैसे फेंकने हैं , गोली अरावली पहाड़ी की झाड़ियों , पेड़-पौधों के पीछे से चलानी है तथा दुकानों-घरों को कैसे आग के हवाले करना है ,यह सब बिना प्रशिक्षण के संभव ही नहीं है । यह कोई एक दिन की घटना प्रायोजित नहीं थी , यदि समय रहते हरियाणा सरकार की अनुशंसा पर अतिरिक्त सैन्य बल तुरंत न पहुंच पाते तो यह कई दिनों तक हिंसा का तांडव चलता रहता। अब जब हरियाणा सरकार ने समय रहते पूरी घटना पर नियंत्रण कर लिया। पुलिस अधीक्षक वरुण सिंगला को बदलकर भिवानी से तेज तर्रार नरेन्द्र बिजारणिया को स्थानांतरित कर दिया तो धीरे-धीरे सब भेद खुलने लगे। अब आस-पास के बड़े-बुजुर्ग कह रहे हैं कि हमारे बच्चें बाहर वालों के बहकावे में आ गये थे , असली अपराधी तो दूसरे राज्यों से आये थे। अब वे यह भी मान रहे हैं कि यह कोई उकसाने वाली घटना नहीं थी बल्कि फुल तैयारी के साथ की गई घटना है। तभी इस यक्ष प्रश्न का उत्तर मिल पाएगा कि असली अपराधी कौन है जो सारी घटना के पीछे रहकर सबकों संचालित कर रहे थे ।

मीडिया बंधुओं से भी निवेदन है कि प्रिंट मीडिया के साथ ही सभी चैनल पर नूंह की वास्तविकता दिखाने का प्रयास करें ताकि फिर ऐसी घटना न हो पाए। निर्दोष लोगों को अपने जान-माल का नुकसान न उठाना पड़े अन्यथा भविष्य में फिर से ऐसी घटना की पुनरावृत्ति हो सकती है ।

 आज बुलडोजर कार्यवाई पर भी नैरेटिव सैट किया जा रहा है कि एक ही समुदाय के लोगों के घर व दुकाने गिराये जा रहे हैं जबकि पुलिस अधीक्षक का कहना है कि समुदाय देखकर नहीं अवैध निर्माण देखकर बुलडोजर चलाया जा रहा है । इन्हीं अवैध रूप से बनी दुकानों में किसी हिंदू भारद्वाज की भी किराये की दूकान थी वह भी चपेट में आयी है । इन गुंडा तत्वों ने वन-विभाग की जमीन पर सैंकड़ों दूकानें बनाई है जिनका 5-6 हजार रुपये के हिसाब से कई लाख किराया वसूल करते हैं जो कि अपराधिक गतिविधियों में लगता है। वास्तव में बुलडोजर से केवल अपराधियों के अवैध निर्माण नहीं तोड़े जा रहे अपितु उनके राजनैतिक संरक्षण से उफान पर चढ़े हौंसले तोड़े जा रहे हैं ।

 वास्तव में मुस्लिम समुदाय के उन गुंडा तत्वों से स्थानीय मुस्लिम किसान वर्ग भी परेशान हैं। अतः यदि जाँच एजेंसियाँ धैर्य के साथ मुस्लिम गाँवों के उन मोहल्लों तक भी जायें जहां हमारी पुलिस आज तक जाने से घबराती रही तो और भी बहुत कुछ उजागर होने की संभावना है । अभी अवसर भी है क्योंकि स्थानीय विरोध की गुंजाइश बहुत कम है और आवश्यकता भी। क्योंकि स्थानीय लोग ही सही जानकारी दे सकते हैं जिससे सही कार्रवाई संभव है और भविष्य के लिए दोनों समुदायों में सुरक्षा व विश्वास का वातावरण बन सके।


स्तंभकार

डॉ उमेश प्रताप वत्स

 लेखक : प्रसिद्ध कथाकार, कवि एवं स्तंभकार है ।

umeshpvats@gmail.com



रविवार, 30 जुलाई 2023

*राजपूत या गुर्जर से पहले वीर हिन्दू सम्राट थे मिहीर भोज*

 *🚩🕉️जय बाबा बर्फानी🕉️🚩*


*कोलकाता* से प्रकाशित देश की बहुत ही प्रतिष्ठित समाचार पत्रिका 


*कोलकाता सारांश* 


में मेरा आलेख 


 *राजपूत या गुर्जर से पहले वीर हिन्दू सम्राट थे मिहीर भोज*


प्रकाशित हुआ है।


कृपया पढ़कर विचार प्रकट करें जी 🙏🏻🕉️🙏🏻


आलेख - राजपूत या गुर्जर से पहले वीर हिन्दू सम्राट थे मिहीर भोज

-डॉ उमेश प्रताप वत्स 


सम्राट मिहिर भोज को लेकर गुर्जर और राजपूत के बीच लम्बे समय से विवाद चल रहा है। दोनों ही समाज एक-दूसरे के विरुद्ध हिंसात्मक होते जा रहे हैं। मई में पश्चिमी यूपी के सहारनपुर में दोनों ही समाज आमने-सामने आ गए थे। टकराव की स्थिति को नियंत्रित करने के लिए जिले में धारा 144 लागू कर इंटरनेट बंद किया गया तथा दर्जनभर से अधिक लोगों को गिरफ्तार कर कुछ के विरुद्ध एफआईआर भी दर्ज की गई। वास्तव में पूरा विवाद सम्राट मिहिर भोज की जाति से जुड़ा हुआ है। जो कि नाक का सवाल बन गया है। गुर्जर समाज के लोग सम्राट मिहिर भोज को गुर्जर मानते हैं, वहीं राजपूत समाज उन्हें एक क्षत्रिय राजा मानता है। देश के कई राज्यों विशेष रूप से उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश और अब हरियाणा में यह विवाद सिर चढ़कर बोल रहा है। 

ताजा विवाद हरियाणा के कैथल जिले का है, जहाँ पुलिस सुरक्षा में ढांड रोड पर स्थानीय भाजपा विधायक लीला राम गुर्जर द्वारा मिहिर भोज की प्रतिमा का अनावरण किया गया। यद्यपि अनावरण से एक दिन पहले, राजपूत समुदाय के लोगों ने शिलालेख में मिहिर भोज को हिंदू सम्राट की बजाय गुर्जर सम्राट लिखे जाने पर आपत्ति जताई और विरोध में प्रदर्शन किया। इसके उपरांत भी जल्दबाजी में प्रतिमा का अनावरण तथा आपत्ति जताने पर पुलिस द्वारा राजपूत समाज पर किये गये लाठीचार्ज ने विवाद को ओर अधिक सुलगा दिया। 

गुर्जर व राजपूत दोनों ही समाज प्राचीन काल से भारत की सुरक्षा हेतु अग्रणी समाज रहे हैं। सभ्य समाज व दायित्ववान व्यक्तियों को देश के प्रति दोनों ही समाज की निष्ठा, देश प्रेम और सुरक्षा भावना को देखते हुए सम्मानित ढंग से विवाद को सुलझाकर दूरदर्शिता का परिचय देना चाहिए। 

यद्यपि जो समाज अपने राष्ट्र के महापुरुषों व संघर्षरत रहे क्रांतिकारियों, अमर बलिदानियों को विस्मृत कर देता है, वह समाज अंत की ओर होता है किंतु हमें अपने महापुरुषों, महान क्रांतिकारियों को जाति-धर्म में बाँटने का प्रयास भूलकर भी नहीं करना चाहिए। क्या होगा यदि राजपूत समाज आगे आकर विस्तृत हृदय की बात रखते हुए कहे कि ठीक है सम्राट मिहिर भोज पूरे राष्ट्र के सम्मानीय हैं, तुम भी उनकी प्रतिमा का अनावरण करो और हम भी करेंगे। इसी तरह गुर्जर समाज भी यदि बात को सुलझाते हुए बोले कि सम्राट मिहिर भोज पूरे देश के महान चक्रवर्ती सम्राट रहे हैं तो हम गुर्जर सम्राट कहने की बजाय उनको हिंदू सम्राट कहकर ही संबोधित करेंगे ताकि विश्वभर में यह संदेश जाये कि हिंदुस्थान के महान पराक्रमी सम्राट रहे हैं मिहिर भोज। इतिहास छत्रपति शिवाजी महाराज को भी राजपूत सिसोदिया वंश से मानता है जबकि मराठवाड़ा में उन्हें भगवान की तरह माना जाता है और मराठा ही मानते हैं ऐसा नहीं है पूरा देश शिवाजी महाराज को सम्मान देता है, उनके कार्यों का गुणगान करता है। महाराणा प्रताप को सारा हिंदुस्थान मानता है। कोई भी समाज उनकी प्रतिमा का अनावरण करें, यह गर्व की बात है। 

हम शहीद भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस, रामप्रसाद बिस्मिल, वीर सावरकर या चंद्रशेखर आजाद की जाति नहीं पूछते हैं। वे पूरे राष्ट्र के सम्मानीय पूजनीय हैं। इसी प्रकार मिहिर भोज पूरे देश के हैं। महान पुरुषों को कभी विवाद का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए। 

संत शिरोमणि रविदास जी व महान ऋषि बाल्मीकि जी के देश में लाखों मंदिर हैं किंतु वास्तविक निष्ठा तब दिखाई देगी जब हर मंदिर में महान संत बाल्मिकी, संत रविदास जी की प्रतिमा हो अपितु इनके साथ ही भगवान परशुराम, ऋषि कश्यप, ऋषि भारद्वाज, ऋषि वशिष्ठ, ऋषि अगस्त्य, महर्षि वेदव्यास, महर्षि दयानंद व विवेकानंद की प्रतिमा एक साथ दिखाई दे। क्यों न इन महान संतो, महापुरुषों, महान सम्राटों, महान राजाओं व महान क्रांतिकारियों को कोई एक समाज नहीं अपितु पूरा राष्ट्र माने? क्यों न पूरा विश्व इनके द्वारा किये गये कार्यों की प्रशंसा करें? क्यों न हम सब इनके समक्ष नतमस्तक हो? ये हम सबके पूर्वज हैं। हम सबके पथप्रदर्शक हैं। 

सातवीं शताब्दी में नागभट्ट प्रथम प्रतिहार राजवंश के राजा थे। पुष्यभूति साम्राज्य के हर्षवर्धन के बाद पश्चिमी भारत पर उनका शासन था। उनकी राजधानी कन्नौज थी। उन्होंने सिन्ध के अरबों को पराजित किया और काठियावाड़, मालवा, गुजरात तथा राजस्थान के अनेक क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया था। 780 ईस्वी में उनकी मृत्यु हो गई। माना जाता है कि मिहिरभोज इस वंश का सर्वाधिक महत्वपूर्ण शासक था। यह रामभद्र व माता अप्पा देवीका पुत्र था। इसका सर्वप्रथम अभिलेख वराह अभिलेख है जिसकी तिथि 893 विक्रम संवत् है। अतः इसका शासनकाल लगभग 836 ई. से प्रारंभ हुआ माना जाता है इसके शासनकाल की अंतिम तिथि 885 ई. थी। कहा जाता है कि 50 वर्षों से अधिक समय तक उत्तर भारत के कुछ हिस्सों पर शासन करने वाले मिहिर भोज का साम्राज्य पश्चिम में मुल्तान से लेकर पूर्व में बंगाल तक और उत्तर में कश्मीर से लेकर दक्षिण में कर्नाटक तक फैला हुआ था। 

मिहिर भोज ने एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की, जिसकी स्थायी राजधानी कन्नौज बनी। कश्मीरी कवि कल्हण की “राजतरंगिणी” में मिहिरभोज की उपलब्धियों पर प्रकाश डाला गया है। अरब यात्री “सुलेमान” ने मिहिरभोज को भारत का सबसे शक्तिशाली शासक बताया है, जिसने अरबों को सिंधु से परे ही आगे बढ़ने से रोक दिया था। मिहिरभोज ने कालिंजर पर अपने अधिकार की स्थापना वहां के चंदेल नरेश जयशक्ति को पराजित करके की थी। गुजरात प्रदेश पर पुनः अपना अधिकार करने के लिए मिहिरभोज को मंडौर की प्रतिहार शाखा के राजा बाऊक का दमन करना पड़ा था। यह अनुमान जोधपुर अभिलेख पर आधारित है। बंगाल के राजा देवपाल के बेटे को शिकस्त देकर सम्राट मिहिर ने उत्तरी बंगाल को भी अपनी सल्तनत में शामिल किया। कन्नौज पर कब्जा करने के लिए उत्तर भारत, बंगाल और दक्षिण भारत के राजाओं की तरफ से कोशिश की गई किंतु वे सफल न हो सके। जिसे त्रिकोणीय संघर्ष कहा गया था। जीवन के अंतिम पड़ाव पर उन्होंने बेटे महेंद्रपाल को सत्ता सौंपी और संन्यास ले लिया। तथ्य बताते हैं कि 72 वर्ष कीआयु में उनका देहांत हो गया था।

कुछ इतिहासकार कहते हैं कि वो गुर्जर समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। हालांकि, उनका यह भी मानना है कि गुर्जर और राजपूतों की उत्पत्ति को लेकर इतिहास विवादित रहा है। 7वीं शताब्दी में हर्षवर्धन के बाद से लेकर 12वीं शताब्दी तक के काल को राजपूत काल कहा जाता है। मध्यकालीन भारत पुस्तक के लेखक और इतिहासकार प्रोफेसर वीडी महाजन कहते हैं, सम्राट मिहिर प्रतिहार वंश के शासक थे। राजपूत समुदाय का तर्क है कि वह प्रतिहार-राजपूत राजवंश से थे, और गुर्जर शब्द का गुर्जर समुदाय से कोई लेना-देना नहीं है, बल्कि यह वर्तमान दक्षिणी राजस्थान और उत्तरी गुजरात के उस क्षेत्र के संदर्भ में है जो उस वक्त उनके साम्राज्य का हिस्सा था। 

 वैसे तो सम्राट मिहिर को लेकर लम्बे समय से विवाद चला रहा है किंतु 9वीं शताब्दी के राजा मिहिर भोज की एक प्रतिमा पहली बार उस वक्त दो समुदायों के बीच विवाद का कारण बन गई जब इसे 8 सितंबर 2021 को मध्य प्रदेश के ग्वालियर में ‘सम्राट मिहिर भोज’ शिलालेख के साथ स्थापित किया गया था। गुर्जर समाज के व्यक्तियों ने बाद में नाम के साथ गुर्जर शब्द जोड़ा दिया, जिसका राजपूतों ने विरोध किया। आज भी यह मामला मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में विचाराधीन है। इसी तरह सितंबर 2021 में तब विवाद पैदा हुआ, जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ दादरी के मिहिर भोज पीजी कॉलेज में सम्राट की प्रतिमा का अनावरण करने पहुंचे। अपने-अपने दावे के बीच गुर्जर समाज ने गौरव यात्रा निकालने का ऐलान किया। राजपूत समाज ने इसका विरोध करते हुए प्रदर्शन किया। उन्होंने शिलापट्ट से गुर्जर शब्द को हटाने को कहा तो गुर्जर समाज के लोगों ने विरोध करना शुरू कर दिया। जबकि योगी आदित्यनाथ ने मंच पर आकर इस विवाद को खत्म कर दिया, लेकिन इस मामले को लेकर राज्य में राजनीति शुरू हो गई। मिहिर भोज का मामला पहले से ही मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की ग्वालियर पीठ द्वारा सुना जा रहा है। गुर्जर नेताओं के लिए बेहतर होता कि वे अदालत के फैसले का इंतजार करते। इस हफ्ते की शुरुआत में हरियाणा के कैथल में अनावरण की गई राजा मिहिर भोज की प्रतिमा को लेकर विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। प्रतिमा पर राजा को ‘गुर्जर’ बताने वाले शिलालेख के विरोध में भाजपा के 29 सदस्यों के पार्टी छोड़ने के बाद मामला ओर उलझ गया है। भाजपा के कैथल जिला अध्यक्ष संदीप राणा ने बताया कि हमने कभी यह मांग नहीं की कि पट्टिका पर गुर्जर की जगह राजपूत लिखा जाए। लेकिन हम चाहते थे कि मिहिर भोज के नाम के पहले हिंदू सम्राट लिखा जाए। जब तक प्रदेश भाजपा अध्यक्ष या मुख्यमंत्री हमारी शिकायतों का समाधान नहीं कर देते, हम अपना इस्तीफा वापस नहीं लेंगे। हिन्दू समाज के दो मुख्य पक्ष आपसी मतभेद में उलझते जायेंगे तो देश को अस्थिर करने वाले धड़े को बैठे-बैठाएं फूट डालने का अवसर मिल जायेगा। मणिपुर में हम देख ही रहे हैं कि किस तरह दो प्रमुख समाज मैतेई और कुकी के आपसी विवाद को कुछ राजनैतिक दलों की सहायता से हिंसात्मक बनाकर देश को विश्वभर में अपमानित किया गया है। अतः इस तरह की कुत्सित मानसिकता वाली ताकत को अपना कंधा न दे अन्यथा वे आपके कंधे पर चढ़कर भारत माता को लहूलुहान कर देंगे। 

गुर्जर समाज को बड़ा दिल दिखाते हुए इस मामले को सुलझाने में पहल करनी चाहिए। जो पहले से प्रतिमा स्थापित हो चुकी हैं, उन पर बेशक गुर्जर शब्द लिखा हो, उन्हें न छेड़ा जाये। किंतु भविष्य में कहीं भी प्रतिमा लगे तो गुर्जर अथवा राजपूत की बजाय हिन्दू सम्राट लिखे जाने का दोनों पक्षों की ओर से स्वागत होना चाहिए। 


- स्तंभकार

डॉ उमेश प्रताप वत्स

 लेखक : प्रसिद्ध कथाकार, कवि एवं स्तंभकार है ।

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सोमवार, 8 अगस्त 2022

मुद्दों से भटके नेता, अब चला नया दाँव - चित्त भी मेरी पट भी

 आलेख :

मुद्दों से भटके नेता, अब चला नया दाँव - चित्त भी मेरी पट भी

- डॉ उमेश प्रताप वत्स 

आपने वह कहावत तो सुनी ही है कि चाकू चाहे खरबूजे पर गिरे या खरबूजा चाकू पर गिरे अंतोगत्वा दोनों ही सूरत में कटना तो खरबूजे को ही है। चुनाव के दिन-प्रतिदिन बदलते परिवेश में यह कहावत सही साबित हो रही है कि शिकारी कोई भी दांव चले जाल में फंस कर फड़फड़ाना तो बेचारी जनता को ही है। वर्तमान चुनावी घमासान में ऐसी परिस्थिति बना दी गई है कि जनता के मुद्दे तो गये तेल लेने। बस विरोधी को पटखनी कैसे देनी है, सारा दारोमदार इसी पर है। हर ब्यान पर हिंदू-मुस्लिम कार्ड खेला जाता है, मुस्लिम को भयभीत कर असुरक्षित होने का एहसास कराया जाता है। विपक्ष ने सत्तासीन पार्टी को धराशायी करने के लिए अभी भी कुछ मिसाइल संजोये रखी हुई है। असहनशीलता का शस्त्र बेशक कमजोर पड़ गया हो किंतु सांप्रदायिकता का घिसा-पीटा मुद्दा अब भी चल जाता है। इस बेदम मुद्दे को समय-समय पर सात समंदर पार से भी धार मिल जाती है। वे जब चाहे घोषणा कर देते हैं कि इस्लाम खतरे में है या सिख, इसाई खतरें में है। बेशक मुस्लिम का भविष्य शिक्षा के कारण, रोजगार के कारण, भाईचारे के कारण या कट्टरता के कारण खतरे में हो किंतु जमीनी समस्याओं से क्या लेना यदि वे दूर हो गई तब उनको भ्रमित करना भी तो मुश्किल होगा। अतः इतना कहना पर्याप्त है कि यदि योगी-मोदी फिर से आ गये तो फलां-फलां खतरे में है। दूसरी मिसाइल है दलित, पिछड़ी जातियों की। उन्हें भी रात-दिन डराया जाता है कि तुम्हारा आरक्षण छिन लिया जायेगा। तुम्हें सड़क पर लाकर खड़ा कर दिया जायेगा। बिहार के पिछले चुनावों में सभी राजनैतिक विश्लेषक भाजपा की एक पक्षीय लहर बता रहे थे किंतु जैसे ही डॉ मोहन भागवत ने कहीं किसी परिपेक्ष्य में यह ब्यान दिया कि आरक्षण की पुनः समीक्षा होनी चाहिए। बस! यह ब्यान मुर्दा पार्टियों के लिए ऐसा रामबाण सिद्ध हुआ कि उन्होंने इसे हाथों-हाथ लपक लिया और कोमा में पड़े लालूजी उछलकर पहुंच गए जनता के बीच कि, 'हमार होते हुए कोनो माइ का लाल हमार भाइयों का आरक्षण छिन सकत है।' यद्यपि भागवत जी का मन्तव्य उन लोगों तक आरक्षण पहुंचाने का था जो वर्षों के बाद भी गरीबी का जीवन जी रहे हैं किंतु राजनैतिक बिसात पर सफाई देने का समय नहीं मिलता औैर उस ब्यान को हथियार बनाकर पिछड़ों का मसीहा बन लालू जी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में सामने आये। 

यह राजनैतिक मैदान तो ऐसे दलदल का समन्दर है कि न जाने अगला पड़ने वाला कदम आपको किस हाल में लेकर खड़ा कर दे। अभी यूपी में सरकार के रणबाँकुरे अति उत्साह में जैसे ही अपने किये गये कामों का हिसाब देने जनता के दरबार में पहुंचे तो विपक्ष के नेता जी ने भी मौके पर चौका जड़ते हुए रटी-रटाई बात फिर से दोहराते हुए कहना शुरु कर दिया कि इन्होंने किया क्या है अब तक, सड़कें हमने बनानी थी, फ्लाईऑवर हमने बनाने थे, मैडिकल कॉलेज की हमारी योजना थी, स्मार्ट सिटी का प्रोजेक्ट भी हमारा था। हम रिबन बाँधते गये और ये मौकापरस्त रिबन काटकर अपना नाम किये जा रहे हैं। अब कोई नेता जी से पूछे कि जब तुम्हें जनता ने पाँच वर्षों के लिए सिंहासन पर बैठाया था तो क्या केवल रिबन बाँधने के लिए बैठाया था। भाई कहीं रिबन काटकर या बिना काटे एक-आध प्रोजेक्ट पूरा तो करा देते। लेकिन जब दो इंच लंबी जुबान से ही काम चल जाये तो फिर विकास का बुलडोजर चलाने की क्या आवश्यकता? चुनाव के मैदान में इतनी खिचड़ी है कि ज्ञात ही नहीं हो पाता की युधिष्ठिर की सेना कौन सी है और दुर्योधन की कौन सी, कौन किसके पक्ष में है किसके विपक्ष में। यहां तो हर-एक सेना एक दूसरे से भिड़ती दिखाई दे रही है। कोई वोट लेने के लिए लड़ रहा है तो कोई वोट काटने के लिए और कोई तो यही गणित सजाकर बैठा है कि यदि मैंने इतने प्रतिशत वोट ले लिये तो फ्लां पार्टी को कितना नुकसान होगा और फ्लां को कितना। अधिकतर नेता जनता को आकर्षित करने के लिए नेक नीयत से उनके मुद्दे उठाने की अपेक्षा चुनाव मैनेजरों के तिकड़मबाज गणित पर ज्यादा निर्भर है। एक बहुत ही समझदार नेता जी पिछली सरकारों द्वारा की गई गल्तियों की सूची लेकर जैसे ही मीडिया में पहुँचे तो सामने वाले नेता जी ने उनके सूची बांचने से पहले ही चिल्लाना शुरु कर दिया कि महिला इस सरकार में असुरक्षित है, सबसे ज्यादा रेप हो रहे हैं, माफियाओं की सरकार चल रही है। रेपिस्ट का बचाव करने वाली सरकार है, साम्प्रदायिकता का जहर घोलती है, अपने-अपने लोगों को रेवड़ी की तरह नौकरियाँ बाँट रहे हैं, भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हुए हैं, विकास कोई किया नहीं विनाश करने पर तुले हुए हैं। मंदिर-मस्जिद, हिंदू-मुस्लिम करते हैं, लोगों की सुध नहीं है। अब सूची वाले नेता जी तो देखते रह गये। यही सब तो वह सूचीबद्ध करके कहने आये थे किंतु यह तो उन्हीं पर उडेल दिया गया। यह है मौके पर चौका। यह प्रयोग बहुत दमदार तरीके से चल रहा है कि कोई मुझे बेईमान कहे तो मैं पहले से ही चिल्लाना शुरु कर दूं कि यह दुनिया का सबसे बेईमान व्यक्ति है, इसके बाद यदि वह कहेगा भी तो बेअसर हो जायेगा। जनता को निरा मूर्ख समझने वाले नेता चुनावी मौसम में इतने रंग दिखाना शुरु कर देते हैं कि गिरगिट भी शरमा जाये। कोई सबकी लैला बनकर सबका मनोरंजन कर रहे हैं तो कोई सबका खसम बनकर दबाव बनाने का प्रयास कर रहे हैं। सीमा पर पाकिस्तान का खतरा है या चीन घात लगाये बैठा है इन सब फालतू की बातों से नेता जी का क्या सरोकार। उनको तो यह पता है कि यदि इस बार भी गद्दी न मिली तो जो सेनापति सुविधाओं के लोभ में छतरी उठाकर साथ चल रहे हैं बाद में ढूंढने पर भी नहीं मिलेंगे। दूसरा नेता जी को यह भय भी सता रहा है कि पिछले दस वर्षों में जो राष्ट्र उत्थान का एक ढाँचा खड़ा हुआ है कहीं फिर से जीतने पर स्थाई भवन तैयार न हो जाए तो रही सही राजनीति की दुकान बंद होने के मुहाने पर खड़ी होगी। ये कभी धारा 370 पर, राममंदिर या तीन तलाक पर बहस नहीं करेंगे क्योंकि उन विषयों पर ये सभी बैकफुट पर है अपितु बहस या ब्यानबाजी उन मुद्दों पर अथवा देशहित के मुद्दों की ओर न जा सके इसी पर पूरा फोक्स रखते हैं तभी नेता जी सत्तारूढ़ पार्टी के सिपहसलारों को निरुत्तर करने के लिए उन्हीं बातों को रखने के माहिर होते हैं जो उनके लिए उठाई जा सकती है, वे पहले ही काऊंटर फाइट छेड़ देते हैं। कहीं न कहीं जनता भी इन्हें यह विश्वास दिला देती है कि पिछले पांच वर्षों में तुमने क्या किया था हमें कुछ याद नहीं है हम तो बस बदलाव चाहते हैं वह अलग बात है कि बाद में यह बदलाव कितना मंहगा पड़ सकता है। सत्तासीन भी सक्षम सारथी पाकर हवा में उड़ रहे हैं कि सब अपने-आप हो जायेगा, हमें कुछ करने की आवश्यकता ही नहीं है। देश का क्या होगा, देश किन हाथों में सुरक्षित रहेगा यदि फिर से सेना की थाली को ही हजम करने वाले आ जाते हैं तो इसके कसूरवार वे भी रहेंगे जो हवा में ही उड़ रहे थे और अपने दायित्व को ठीक से निभाने में असक्षम रहे। देश की जनता को भी जागना पड़ेगा कि हम इतने भी मूर्ख नहीं है कि अच्छा-बुरा भी न समझ पाये। देश इस बात का साक्षी है कि भीड़तंत्र की अपेक्षा मौन धारण किये वो वोटर विजयी मुकुट पहनाते है जो सभी परिस्थितियों को देख-समझकर आने वाली पीढ़ी के भविष्य को ध्यान में रखते हुए मैदान में उतरते हैं बशर्ते वह वोट डालने घर से बूथ तक आ जाये। अन्यथा पश्चिम बंगाल में कोरोना के भय से यही मौन तपस्वी घरों में दुबके रह गये और सैंकड़ों सीटे एक हजार से भी कम अन्तर पर दीदी जीतकर ले गई। राजनीति में जीत का महत्व है कैसे मिली यह सब समय की रेत में ढक जाता है। अतः जनता को ही नये भारत के निर्माण के लिए आगे आना होगा। 

-डॉ उमेश प्रताप वत्स 

umeshpvats@gmail.com

यमुनानगर, हरियाणा 

9416966424 

सोमवार, 17 जनवरी 2022

'दीमक' नहीं देश को समर्पित है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

आलेख: 

दीमक' नहीं देश को समर्पित है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

- डॉ उमेश प्रताप वत्स

पिछले दिनों कांग्रेस के वरिष्ठ नेता, मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एवं राज्यसभा सदस्य दिग्विजय सिंह ने आरएसएस की तुलना दीमक से की। विश्व के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठन के बारे में इतने निचले स्तर पर ब्यान देना बुझते जा रहे फड़फड़ाते दीपक की स्थिती को ब्यान कर रहा था। यह कोई पहला अवसर नहीं है कि जब दिग्गी राजा ने आरएसएस के विरुध्द इस प्रकार का जहर उगला हो अपितु यदा-कदा जब भी उन्हें अवसर मिला दिग्गी राजा ने संघ परिवार के लिए विवादास्पद ब्यान देकर अपने साथ-साथ कांग्रेस को भी मुश्किल में डाला है। अभी हालिया ब्यान में उन्होंने अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि "आप ऐसे संगठन से लड़ रहे हैं, जो ऊपर से नहीं दिखता। जैसे घर में दीमक लगती है, यह उसी तरह से काम करता है।"

दीमक जिस वस्तु में लग जाती है उसे समाप्त कर देती है जबकि संघ 1925 से ही राष्ट्र को परम वैभव पर पहुंचाने के लिए व्यक्ति निर्माण की प्रक्रिया में मौन तपस्वी बनकर सतत् प्रयासरत है।

आगे उन्होंने कहा कि, 'संघ रजिस्टर्ड संस्था नहीं है। इसकी सदस्यता नहीं है, कोई अकाउंट नहीं है। संघ का कोई कार्यकर्ता जब आपराधिक कृत्य में पकड़ा जाता है, तो वे कहते हैं कि हमारा सदस्य ही नहीं है।'

वर्तमान में वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह के उक्त ब्यान को समझने की अति आवश्यकता है अन्यथा भारत के हजार टुकड़े चाहने वाले इस प्रकार के ब्यान को ही ढाल बनाकर वैमनस्य फैलाने का कुचक्र चलाने में ओर अधिक ताकत के साथ लगेंगे।

यह सही है कि संघ का कोई रजिस्ट्रेशन नहीं है ना ही कोई सदस्यता है और कोई अकाउंट भी नहीं है किंतु आनन्दित और आश्चर्यचकित कर देने वाली बात यह है कि रजिस्टर्ड संस्था न होने पर भी आरएसएस विश्व की सबसे बड़ी स्वयंसेवी संस्था है। सदस्यता न होने पर भी करोडों देशवासी तन-मन-धन से इसके साथ जुड़े हुए हैं। अकाउंट न होने पर भी पिछले 97 वर्षों से आज तक कभी धन को लेकर कोई विवाद नहीं हुआ। "राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, राष्ट्रीय स्तर पर स्वयं की प्रेरणा से राष्ट्रहित में सेवा कार्य करने वाले स्वयंसेवकों का संगठन है।" संस्थाएं रजिस्ट्रेशन इसलिए कराती है ताकि वह सरकार अथवा प्रशासन से आर्थिक सहयोग लेकर सामाजिक कार्यों की योजना बना सके और यह भी सच्चाई है कि उसे धनदाता की निष्ठा पर ही निर्भर रहना पड़ता है, उनके तौर-तरीकों से कार्य करना विवशता बन जाती है। ऐसी स्थिति में आप विशुध्द रूप से कदापि राष्ट्रीय कार्य को मूर्त रूप नहीं दे सकते। रही बात अपराध की तो संघ का इतिहास उठाकर देख लें। पूर्वाग्राही होकर आरोप तो बहुत लगाये गये किंतु जाँच के बाद सभी आरोप निराधार पाये गये। सबसे बड़ा आरोप तो तब लगा जब 30 जनवरी 1948 सांय लगभग सवा पांच बजे अपने अनुचरों से घिरे महात्मा गांधी की नत्थूराम गोडसे ने हत्या कर दी जिसका आरोप भी संघ पर ही लगाया गया। महात्मा गांधी की हत्या का षडयंत्र रचने का आरोप पूर्व में तो सावरकर की हिंदू महासभा पर लगाया गया किंतु शीघ्र ही राजनैतिक लाभ लेने के लिए आरोप की दिशा घुमाकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर कर दी गई। कांग्रेस का एक वर्ग जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बढ़ते प्रभाव से असहज महसूस कर रहा था, उसे इस संगठन को खत्म करने का एक अच्छा अवसर नजर आया। अतः तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपने भाषणों में गांधी हत्या के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को दोष देना शुरू कर दिया। उन्होंने अमृतसर में घोषणा की, ‘राष्ट्रपिता की हत्या के लिए आरएसएस जिम्मेदार है।’

जबकि कोर्ट में गोडसे के दिये गये ब्यान के अनुसार,"13 जनवरी 1948 को दिन में क़रीब 12 बजे महात्मा गांधी दो माँगो को लेकर भूख हड़ताल पर बैठ गए। पहली माँग थी कि पाकिस्तान को भारत 55 करोड़ रुपए दे और दूसरी दिल्ली में मुसलमानों पर होने वाले हमले रुकें। गांधी की भूख हड़ताल के तीसरे दिन यानी 15 जनवरी को भारत सरकार ने घोषणा की कि वो पाकिस्तान को तत्काल 55 करोड़ रुपए देगी। 'बस! इसी निर्णय से व्यथित होकर मैंने महात्मा गांधी जी पर गोलियां चला दी।"

हत्या की योजना में शामिल आठ लोगों पर कोर्ट में मुकदमा दर्ज हुआ। जज आत्माचरण ने गांधी की हत्या में नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे को फाँसी की सज़ा सुनाई। विष्णु करकरे, मदनलाल पाहवा, शंकर किस्टैया, गोपाल गोडसे और दत्तात्रेय परचुरे को आजीवन क़ैद की सज़ा सुनाई गई।

जज ने सावरकर को बेगुनाह करार दिया और उन्हें तत्काल रिहा करने का आदेश दिया और आरएसएस पर तो कोर्ट में कोई आरोप था ही नहीं फिर भी नेहरू जी के राजनैतिक भय के कारण संघ को बदनाम, अपमानित करने का घोर प्रयास हुआ। दुनिया में शायद ही किसी संगठन की इतनी आलोचना की गई होगी, वह भी बिना किसी आधार के। संघ के ख़िलाफ़ लगा हर आरोप आख़िर में पूरी तरह कपोल-कल्पना और झूठ साबित हुआ है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि आज भी कई लोग संघ को इसी नेहरूवादी दृष्टि से देखते हैं।  गाँधी हत्या के बाद आरएसएस के सरसंघचालक गोलवरकर जी को जब नेहरू जी की जिद के कारण नागपुर में गिरफ्तार कर लिया गया तब उन्होंने कहा था कि, ‘संदेह के बादल जल्द छट जाएंगे और हम इससे बेदाग बाहर आएंगे। तब तक बहुत सारे अत्याचार होंगे, लेकिन हमें धैर्य के साथ यह सब सहन करना चाहिए। मेरा दृढ़ विश्वास है कि संघ के स्वयंसेवक इस अग्निपरीक्षा में सफलता हासिल करेंगे।’ अंततः आरएसएस पर प्रतिबंध 11 जुलाई 1949 की आधी रात को ही हटाना पड़ा। गुरूजी को 13 जुलाई 1949 को बैतूल जेल से रिहा किया गया।

जब पाकिस्तानी सेना की टुकड़ियों ने अक्तुबर 1947 में कश्मीर की सीमा लांघने की कोशिश की तो सैनिकों के साथ कई स्वयंसेवकों ने भी अपनी मातृभूमि की रक्षा करते हुए लड़ाई में प्राण दिए थे। विभाजन के दंगे भड़कने पर जब नेहरू सरकार पूरी तरह हैरान-परेशान थी तब संघ ने पाकिस्तान से जान बचाकर आए शरणार्थियों के लिए 3000 से ज़्यादा राहत शिविर लगाए थे।

सेना की मदद के लिए देश भर से संघ के स्वयंसेवक जिस उत्साह से सीमा पर पहुंचे, उसे पूरे देश ने देखा और सराहा। स्वयंसेवकों ने सरकारी कार्यों में और विशेष रूप से जवानों की मदद में पूरी ताकत लगा दी। सैनिक आवाजाही मार्गों की चौकसी, प्रशासन की मदद, रसद और आपूर्ति में मदद, और यहां तक कि शहीदों के परिवारों की भी चिंता संघ के स्वयंसेवकों ने की।

1965 में पाकिस्तान से युद्ध के दौरान लालबहादुर शास्त्री जी ने क़ानून-व्यवस्था की स्थिति संभालने में मदद देने और दिल्ली का यातायात नियंत्रण अपने हाथ में लेने का आग्रह किया ताकि इन कार्यों से मुक्त किए गए पुलिसकर्मियों को सेना की मदद में लगाया जा सके। घायल जवानों के लिए सबसे पहले रक्तदान करने वाले भी संघ के स्वयंसेवक थे। युद्ध के दौरान कश्मीर की हवाईपट्टियों से बर्फ़ हटाने का काम संघ के स्वयंसेवकों ने किया था ताकि सेना के जहाज बिना गतिरोध के आवाजाही कर सके।

21 जुलाई 1954 को दादरा को पुर्तगालियों से संघ के स्वयंसेवकों के द्वारा ही मुक्त कराया गया, 28 जुलाई को नरोली और फिपारिया मुक्त कराए गए और फिर राजधानी सिलवासा मुक्त कराई गई। संघ के स्वयंसेवकों ने 2 अगस्त 1954 की सुबह पुतर्गाल का झंडा उतारकर भारत का तिरंगा फहराया, पूरा दादरा नगर हवेली पुर्तगालियों के कब्जे से मुक्त करा कर भारत सरकार को सौंप दिया। संघ के स्वयंसेवक 1955 से गोवा मुक्ति संग्राम में प्रभावी रूप से शामिल हो चुके थे। संघ के कार्यकर्ताओं ने गोवा पहुंच कर आंदोलन शुरू किया। हालत बिगड़ने पर अंततः भारत को सैनिक हस्तक्षेप करना पड़ा और 1961 में गोवा आज़ाद हुआ।

आज भी कहीं कोई ट्रेन दुर्घटना हो, विमान दुर्घटना हो, चक्रवाती तुफान आये अथवा बाढ़ की विभीषिका हो सर्वप्रथम संघ के स्वयंसेवक ही अग्रिम पंक्ति में खड़े दिखाई देते हैं।

"सर्वे भवंतु सुखिन: सर्वे संतु निरामया,

सर्वे भद्राणि पश्यंतु मा कश्चिद् दुख:भागभवेत।"

इस भारतीय चिंतन को प्रबल बनाने का एक मात्र यशस्वी साधन संघ कार्य है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने संपूर्ण हिंदू समाज के संगठन के माध्यम से इस राष्ट्र को परम वैभव तक पहुंचाने का उदात्त  लक्ष्य अपने सामने रखा है। लक्ष्य प्राप्ति के लिए प्रत्येक व्यक्ति को जागृत संस्कारित संगठित कर शक्तिशाली समाज एवं राष्ट्रीय जीवन की योजना बनाई है तथा दैनिक शाखा व अन्य विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से समाज में प्रचलित ऊंच- नीच, छुआछूत आदि रूढ़ियों को समाप्त कर समरसता एवं स्वाभिमान का भाव जगाकर ,अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल होता हुआ दिखाई दे रहा है। अतः देश की जनता अब सही और गलत का निर्णय लेने में सक्षम है। किसी को भी आरएसएस जैसे सर्वमान्य संगठन के बारे में विवादित ब्यान देने से बचना चाहिए।

- डॉ उमेश प्रताप वत्स

umeshpvats@gmail.com

यमुनानगर, हरियाणा

9416966424


मंगलवार, 4 जनवरी 2022

लघुकथा - शादी

 जैसे ही अमरसिंह की रिंगटोन बजी, श्मशानघाट में सबका ध्यान उसकी ओर गया। थोड़ा पीछे होकर फोन रिसीव करते हुए पत्नी को बोले, "तुम तैयार होकर बाहर रोड़ पर आ जाओ," यही से सीधे शादी में चल पड़ेंगे।"


कहानी-संग्रह "उम्र की साँझ पर" समीक्षा

 साहित्य समाज का दर्पण होता है। यह कथन निसंदेह सत्य है जिसकी प्रमाणिकता के लिए आप किसी भी काल खंड का अध्ययन करके देख लीजिए। मुंशी प्रेमचंद, भारती, निराला, पंत, दिनकर आदि रचनाकारों ने तात्कालिक परिस्थितियों का चरित्रचित्रण अपनी कृतियों में किया है। रचनाकार के कृतित्व से ही व्यक्तित्व झलकता है। लेखक अपने समस्त जीवन की अंतर्व्यथाओं और संघर्षों का अनुभव एक दर्पण की भांति समाज के समक्ष प्रस्तुत करता है जो मार्गदर्शन का अद्भुत व अनुपम उदाहरण होता है जिस पर चलकर हम अपना जीवन सुगम बना सकते हैं और बनाते भी है। साहित्य ने ही सर्वथा समाज की दिशा तय की है। इसी कड़ी में डॉ उमेश प्रताप वत्स जी का प्रस्तुत कहानी-संग्रह "उम्र की साँझ पर " एक प्रबल उदाहरण है। मुझे यह स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं है कि प्रस्तुत कहानी-संग्रह को यदि संस्मरणात्मक कथा-संग्रह कहा जाए।

इस संग्रह की कहानियाँ 'आखिर वह कौन था' 'चरखों की पंचायत', 'बहू का धर्म', 'एडवेंचर कैंप', 'उम्र की साँझ पर', 'सज्जन पुरुष', 'दया' और 'स्कूल की फीस' की लेखक ने काल्पनिक रचना नहीं की है अपितु इनमें मुख्य पात्र या सहायक पात्र के अपने बाल्यकाल, किशोर एवं यौवन काल का जीवंत अभिनय किया है और आज अर्थात् वर्तमान काल में पूर्ण ईमानदारी के साथ पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर दी है। साहित्यकार अपनी कृतियों के माध्यम से समाज के समक्ष जीवन के सैद्धांतिक पक्ष के साथ-साथ प्रयोगात्मक पक्ष भी रखते हैं। डॉ उमेश प्रताप वत्स जी ने जीवन के प्रयोगात्मक पक्ष में अपने अब तक के समस्त जीवन की तपस्या को अति सुंदर ढ़ंग से प्रस्तुत किया है जिसमें संस्कारों के उच्चतम आयामों को छूने के साथ मानवीय, पारिवारिक, सामाजिक मूल्यों का प्रदर्शन बखूबी किया है। 

'आखिर वह कौन था' कहानी में डॉ वत्स ने छात्रावास में रहने वाले किशोरावस्था छात्रों की

जिज्ञासाओं, मन में उपजी आशंकाओं को भय व साहस के मिश्रित भावों के साथ सफलतापूर्वक उकेरा है। 'स्कूल की फीस' भी उसी कालखंड का दर्शन करवाने के साथ-साथ छात्रों की मानसिक व शारीरिक प्रताड़ना के साथ-साथ विपरीत आर्थिक परिस्थितियों में भी माता-पिता के मानसिक व शारीरिक संघर्ष को उकेरती है जो सैंकड़ों कष्टों को सहते हुए भी अपने बच्चों की बेहतर शिक्षा के लिए कटिबद्ध है। 'चरखों की पंचायत' कहानी ने दादी-नानी की स्मृति को पुनः जीवित कर दिया जो मेरे अनुसार प्रत्येक बच्चें के जीवन में स्वर्णकाल की भांति है। आज की भौतिक जिंदगी में शायद ही उस सुखद दृश्य की कल्पना कर सके जो लेखक ने इस कहानी में प्रस्तुत किया है। उस समय कैसे दादी, ताई, चाची व आस-पड़ोस की महिलाएं सामूहिक रूप से चरखा कातती हुई परम्परागत लोकगीतों की बारिश करती थी। चरखा कातना व्यवसाय के साथ-साथ महिलाओं की समस्याओं को उठाने का केंद्र भी होता था। लेखक ने इस कहानी में बालिका शिक्षा पर भी जोर दिया है। 'बहू का धर्म' कहानी में संस्कारी बहू अपने मान-सम्मान की चिंता न कर अपने ससुर की मर्यादा बनाए रखने के लिए अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करती है। निज हित को त्याग ससुराल हित के लिए झंझावातों में उलझकर भी अपना पथ नहीं त्यागती। 

 'एडवेंचर कैंप' कहानी में प्रेम में उपेक्षित युवा अपने क्षोभ को शांत करने के लिए हिंसा पर उतर आता है। 

 'सज्जन पुरुष' कहानी के माध्यम से लेखक ने समाज के ऐसे लोगों पर कटाक्ष किया है जो अपनी सुविधानुसार मुखौटे बदलता रहता है। उसे सामाजिक पीड़ाओं से कोई सरोकार नहीं है। वह केवल और केवल निज हित का ही चिंतन करता है। सज्जन पुरुष तो अन्य व्यक्तियों को भी यही सुझाव देते हैं कि दूसरों के जीवन में उपजी कठिनाइयों में हस्तक्षेप करना असमाजिक व अमर्यादित कार्य है। 

 'दया' कहानी के माध्यम से लेखक ने दर्शाया है कि किस प्रकार लोग स्वार्थ-सिद्धि के लिए संवेदनशील व सहायक प्रवृत्ति वाले इंसानों की भावनाओं से खेलकर ठगने का कार्य करते हैं। इनके इन अनुचित कृत्यों से कई बार जरूरतमंद व्यक्ति सहायता पाने से वंचित रह जाते हैं। 

 कहानी संग्रह की शीर्षक कहानी "उम्र की साँझ पर" में मुख्य पात्र कुश्ती का सुप्रसिद्ध खिलाड़ी है जो आस-पास के क्षेत्र की शान है। समाज में उसके व्यक्तित्व का प्रभुत्व व लोगों के दिल में अगाध श्रद्धा के उपरांत उम्र की ढलान पर संतान द्वारा उपेक्षित किये जाने पर वह यमराज की कृपा की अपेक्षा करता है। मानवीय व पारिवारिक मूल्यों के ह्रास पर डॉ. वत्स ने सफलतापूर्वक उदाहरण प्रस्तुत किया है। 

 "कुली नं. 122" बॉलीवुड की चकाचौंध से प्रेरित युवाओं को घर से भागने की स्थिति को इंगित करती है। लंबे संघर्ष व टूटते मनोबल के कारण उन्हें अन्य कार्य करने को विवश होना पड़ता है। कहानी "आइ. पी. एस. नेता" में संस्कारी युवा अंतिम क्षणों में अपना धैर्य नहीं टूटने देता और जनता के समर्थन से संघर्ष करता हुआ भ्रष्ट तंत्र के विरुद्ध खड़ा रहता है और लक्ष्य की प्राप्ति के लिए यथासंभव प्रयास करता है और तमाम अवरोधों के बावजूद कर्त्तव्य पथ पर निरंतर बढ़ता रहता है।

 डॉ वत्स ने अपनी इस कृति के माध्यम से युवाओं को झकझोरते हुए निस्वार्थ कर्म करने और प्रेरणा देने का कार्य सफलतापूर्वक किया है। लेखक ने युवाओं की भावना का सही व सटीक विश्लेषण कर उनके उत्तम मार्गदर्शन का सफल प्रयास किया है। लेखक के सार्थक प्रयास ने उनके उद्देश्य की सफल प्राप्ति कर ली है, यह कहने में मुझे कोई संदेह नहीं है।

 छात्रावास, जीवन के संघर्ष, विविध आयामों एवं साहसिक घटनाओं का प्रतिफल है कहानी-संग्रह। भाषा की दृष्टि से भी यह उत्तम कृति है। जिसमें लेखक ने आम बोलचाल की भाषा के स्तर को स्थानीय शब्दों का प्रयोग करते हुए उच्चतम श्रेणी तक उठा दिया है। ग्रामीण कहावतों व लोकगीतों की पंक्तियो को उत्तम ढ़ग से समायोजित कर इन्होंने पुस्तक को उच्च स्तरीय बना दिया है। भाषा शैली का प्रभाव पाठकवृंद को पुस्तक से जोड़ने में सहायक सिद्ध हुआ है। उत्तम साहित्य प्रेमियों को यह कहानी-संग्रह अवश्य पढ़ना चाहिए क्योंकि यह पुस्तक आन्नद के साथ-साथ साहित्यिक संतुष्टि भी प्रदान करती है।

 समीक्षक

 नरेश चौधरी

 मांधना, पंचकूला